क्या दीदी से दूर ही रहेगी दिल्ली पिछले चुनाव में ३4 और 22 सीटें जीतकर भी TMC नहीं बचा पाई राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

कोलकाता। अपनी स्थापना के कुछ माह बाद ही जिससे हाथ मिलाकर केंद्र की सत्ता में अहम भागीदार बनी, आज उसी के कारण तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक दिख रही है। इस आम चुनाव में एक समय लग रहा था कि तृणमूल कांग्रेस विपक्षी गठबंधन आईएनडीआई के लिए शक्ति साबित हो सकती है, लेकिन ममता बनर्जी ने कुछ ऐसी राह पकड़ी कि कांग्रेस हाथ मलते रह गई।वैसे तृणमूल के लिए यह भी कह सकते हैं कि 2014 से लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से तृणमूल ‘हार’ जा रही है। भले ही 2011 से लगातार तृणमूल कांग्रेस बंगाल की सत्ता पर काबिज है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में वह अपनी पैठ और पकड़ बनाने में विफल रही है।एक जनवरी, 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल का गठन किया था। उसके बाद 1998 में सात, 1999 में आठ, 2004 में एक और 2009 में 19 लोकसभा सीटें जीतीं। साल 2014 से पहले तक भाजपा या फिर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर दिल्ली की राजनीति में तृणमूल ने अपनी उपयोगिता बना रखी थी, पर 2014 में 42 में से 34 और 2019 में 22 सीटें जीतने के बाद भी तृणमूल के हाथ कुछ नहीं आ रहा। साल 2016 और 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों में लगातार भारी जीत दर्ज करने के बावजूद तृणमूल के लिए राष्ट्रीय राजनीति के द्वार नहीं खुल रहे हैं।मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी से लेकर उनके भतीजे व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी तक चुनावी प्रबंधन देखने वाले प्रशांत किशोर का साथ लेकर भी बंगाल के बाहर कुछ अधिक नहीं कर पाए। आज तो स्थिति यह हो चुकी है कि 2016 में तृणमूल को जो राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था, वह भी पिछले वर्ष छिन गया। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 77 सीटों पर रोककर ममता तीसरी बार जब सत्ता में लौटीं तो तृणमूल नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष के चेहरे के रूप में उन्हें प्रस्तुत करने लगे।

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