
कोरबा। कोयला खदानों में होने वाले कामकाज के कारण वायु प्रदूषण जैसे संकट उत्पन्न होते हैं और इससे बहुत बड़ा वर्ग घिरता है, यह बात तो समझ में आती है। लेकिन क्या इससे परे केवल किसी खास क्षेत्र में समस्याएं उत्पन्न हो सकती है और समूह विशेष की जीवन शैली पर असर पड़ सकता है, ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आदिम जाति कल्याण और स्वास्थ्य विभाग मिलकर एक मिशन पर काम कर रहे हैं। जिसके अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों पर पडऩे वाले प्रभाव को लेकर अध्ययन होगा और उनका परीक्षण भी किया जाएगा। जिले में मलेरिया और डेंगू उन्मूलन के बाद इस तरफ काम किया जाना है। अक्टूबर के पहले पखवाड़े में अनुसूचित जनजाति वर्ग के स्वास्थ्य से संबंधित कामकाज अभियान के तहत करने की योजना बनाई गई है। इस बारे में जिला अधिकारी और ट्राइबल वेलफेयर डिपार्टमेंट की संचालक का वर्चुअल संवाद हो चुका है जिसमें कार्ययोजना पर मंत्रणा हुई। काम कैसे करना है और इसके क्या-क्या पहलू हो सकते हैं, इसे शामिल किया गया है। बताया गया कि कोरबा जिले के कोरबा, कटघोरा और पाली विकासखंड के उन गांवों को योजना का हिस्सा बनाया गया है, जो साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की ओपन कास्ट और अंडरग्राउंड माइंस के नजदीक स्थित है। महसूस किया गया है कि खदानों में कोयला खनन के लिए अपनाई जाने वाली प्रणाली और इसके बाद के सोपान से आसपास की आबादी और उसकी जीवन पद्धति पर प्रतिकूल असर पड़ रहे हैं। पूरे मामले में केवल अनुसूचित जनजाति वर्ग का ध्यान रखा गया है और उन्हें केंद्रित करते हुए इस अभियान को संचालित किया जाना है। बताया गया है कि खदानों के नजदीकी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के लोक जीवन और वातावरण में खदानों के चलते किस प्रकार के प्रभाव पड़ रहे हैं। उनका स्वास्थ्य किस तरीके से प्रभावित हो रहा है और वे किन चुनौतियों का सामना करने को मजबूर हैं। इसलिए स्वास्थ्य विभाग और ट्राइबल वेलफेयर मिलकर इस दिशा में काम करेगा। जानकारी के अनुसार इस कड़ी में खदान क्षेत्र के आसपास निवासरत जनजाति परिवारों के फेफड़े, आंख व त्वचा का परीक्षण करते हुए उनकी काउंसलिंग की जाएगी। इसके साथ ही विस्तार से यह देखा जाएगा कि संबंधित क्षेत्रों में समस्याएं किस कदर हैं और इनके समाधान के लिए क्या कुछ करना बेहतर होगा।





















