कोरबा। कई राज्यों को बिजली आपूर्ति करने वाली कोरबा जिले की एनटीपीसी परियोजना के लिए पांच दशक पहले अपनी जमीन देने वाले 150 से ज्यादा लोग अभी भी नौकरी के लिए परेशान हो रहे हैं। दावा है कि प्रबंधन ने दहाई की संख्या में प्रभावित लोगों को नौकरी दी और बाकी को प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया। समय बढऩे के साथ विस्थापितों की उलझने और ज्यादा बढ़ती जा रही है।
2600 मेगावाट बिजली का उत्पादन एनटीपीसी की कोरबा परियोजना की सात इकाईयां कर रही है। स्थापना के समय 2100 मेगावाट की सकल उत्पादन क्षमता इस परियोजना की थी। हाल के वर्षों में इसके लिए विस्तार की अनुमति भारी सरकार से पर्यावरण मंत्रालय ने दी। उक्तानुसार 500 मेगावाट क्षमता की एक और इकाई यहां पर लगी। इन सबके बावजूद भूविस्थापितों की रोजगार से लेकर दूसरी उलझने जस की तस कायम है। खबर के मुताबिक 80 के दशक में एनटीपीसी के लिए चारपारा कोहडिय़ा और आसपास के लोगों की 193 एकड़ जमीन का अर्जन किया गया था। तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने राजस्व विभाग के जरिए इस प्रक्रिया को पूरा किया। उक्तानुसार नियमों के तहत प्रभावित लोगों को आवासीय और गैर आवासीय जमीन के लिए मुआवजा का भुगतान किया गया। विस्थापन और पुनर्वास नियमों के अंतर्गत संबंधित क्षेत्र में स्कूल, अस्पताल, सड़ व अन्य बुनियादी सुविधाएं जुटाई गई। अनिवार्य रूप से भूविस्थापितों को रोजगार देने का नियम था जो सही समय पर पूरा नहीं किया गया। जमीन अर्जन के कई दशक बीतने पर इस मसले पर झूल रहे लोग समस्याओं से घिरते जा रहे हैं। कुछ दिनों से वे इस विषय को लेकर एनटीपीसी के खिलाफ धरना दे रहे हैं। उनका आरोप है कि औपचारिकताएं पूरी करने के नाम पर समय पूरा किया जा रहा है और हमारे सामाजिक हितों की अनदेखी की जा रही है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर जमीन लेने के एवज में नौकरी दिए जाने को लेकर एनीपीसी को अड़चने क्यों हो रही है और इसमें एनटीपीसी का आखिर नुकसान क्या है। विस्थापितों के निशाने पर प्रशासन भी है जिसने काफी लंबा समय बीतने पर भी इस मामले में तरीके स सुनवाई नहीं की। अब जाकर लंबित मामले की समीक्षा का विचार आया है। इससे क्या हासिल होगा यह बाद में पता चलेगा।