
नईदिल्ली, 0५ सितम्बर ।
भारत ने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए 2022 में जलवायु वित्त में 1.28 अरब डॉलर का योगदान दिया है। बहुपक्षीय विकास बैंकों के माध्यम से किया गया भारत का योगदान कुछ विकसित देशों के योगदान से भी ज्यादा है। ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक ओडीआइ और ज्यूरिख क्लाइमेट रेजिलिएंस अलायंस के विश्लेषण में कहा गया है कि सिर्फ 12 विकसित देशों ने 2022 में अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त में अपना उचित हिस्सा दिया है। इनमें नार्वे, फ्रांस, लक्जमबर्ग, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क, स्विटजरलैंड, जापान, नीदरलैंड, आस्ट्रिया, बेल्जियम और फिनलैंड जैसे देश शामिल हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु वित्त में महत्पपूर्ण कमी का कारण अमेरिका का अपने उचित हिस्से का योगदान न करना है। वहीं, आस्ट्रेलिया, स्पेन, कनाडा और ब्रिटेन ने भी इस मोर्चे पर उम्मीद से खराब प्रदर्शन किया है। विश्लेषण में शीर्ष 30 उच्च आय वाले और औद्योगिक रूप से विकसित देशों की पहचान की गई, जिन्होंने 2022 में विकासशील देशों को पर्याप्त जलवायु वित्त प्रदान किया है। इस समूह में पोलैंड और रूस जैसी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं,जो मौजूदा समय में संक्रमण काल से गुजर रही हैं।
इसके अलावा 1992 से उच्च आय वाले देश का दर्जा प्राप्त करने वाले देश जैसे चिली, कुवैत, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया और बड़ी आबादी के साथ मध्यम आय वाले देश-ब्राजील,चीन, भारत, इंडोनेशिया, मेक्सिको, नाइजीरिया, फिलीपींस और पाकिस्तान भी इस समूह में शामिल हैं।विकसित देशों जैसे ग्रीस ने 2022 में जलवायु वित्त में 0.23 अरब डॉलर, पुर्तगाल ने 0.23 अरब डॉलर, आयरलैंड ने 0.3 अरब डॉलर और न्यूजीलैंड ने 0.27 अरब डॉलर का योगदान दिया है। चीन ने बहुपक्षीय बैकों के माध्यम से 2.52 अरब डॉलर, ब्राजील ने 1.35 अरब डॉलर, दक्षिण कोरिया 1.31 अरब डॉलर और अर्जेटीना ने 1.01 अरब डॉलर का योगदान दिया है।विकसित देशों ने 2009 में कोपेनहेगन में हुई जलवायु वार्ता काप 15 में सामूहिक रूप से 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर जलवायु वित्त में योगदान करने का वादा किया था।
यह रकम जलवायु परिवर्तन रोकने और और इसके प्रभाव से निपटने में विकासशील देशों की मदद के लिए है।सामूहिक योगदान का मतलब है कि किसी एक विकसित देश को तय रकम का योगदान करने के लिए नहीं कहा जा सकता है। इसीलिए भारत सहित दूसरे विकासशील देश जलवायु वित्त में योगदान के मोर्चे पर विकसित देशों की जवाबदेही बढ़ाने की व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं।















