
कोरबा। एक तरफ सरकार जहां गरीब कमजोर वर्ग को सुविधा युक्त सरल इलाज देने का दावा करती है। वहीं, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत प्रशासन के इन्हीं दावों की पोल खोलती नजऱ आ रही हैं। मामला कोरबा जिले का है, जहां सरकार के सारे वादे जिला अस्पताल में धूल चाटते नजर आ रही है। ग्रामीण क्षेत्र से आए गरीब यहां समुचित इलाज को तरस रहे है। जिला अस्पताल में पूर्ण इलाज के बजाय डॉक्टर डिस्चार्ज करने की कवायद करते नजऱ आ रहे हैं। ऐसे में गरीब आदमी करे तो क्या करे…? मजबूरी में गांव के झोलाछाप डाँक्टरों से गरीबी गुजारा इलाज करवाने को विवश रहते है।
दरअसल ताजा मामला पोड़ी उपरोड़ा ब्लाक से सामने निकलकर आया है। इस ब्लाक के दूरस्थ ग्राम केशलपुर के रहने वाले आनंदराम यादव का शुगर बढऩे और ब्लड की कमी के कारण परिजन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कटघोरा लेकर पहुँचे, जहां भर्ती कर प्राथमिक उपचार पश्चात दूसरे दिन मरीज को जिला चिकित्सालय रिफर किया गया। किन्तु यहां भर्ती होने के बाद आनंदराम को अब सरकारी अस्पताल की लापरवाही का शिकार होना पड़ा रहा है। डॉक्टरों ने पहले मरीज को भर्ती रखा और दो दिन पूर्व उसे चार यूनिट ब्लड चढ़ाया गया। जिसके बाद डॉक्टर इस बात का हवाला देते हुए मरीज को डिस्चार्ज कर रहे है कि वह स्वस्थ है, जबकि मरीज वर्तमान हालात में चलने फिरने के लायक भी नही है। मामले में परिजनों का कहना है कि 5 दिन पूर्व मरीज को जिला अस्पताल में भर्ती किया गया। मरीज की इलाज के लिए परिजन हर दिन कुछ न कुछ सामान खरीदते रहे। अब मरीज को खून चढऩे के दूसरे ही दिन दबावपूर्वक छुट्टी दिया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र से और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का घर चलाने वाला शख्स खुद मरीज बन गया है। ऐसे में उपचार की औपचारिकता निभा अस्पताल से चलता किये जाने से मरीज आखिर कहां जाएगा, यह ज्वलंत सवाल आज जवाब चाहता है।















