जांजगीर चांपा। जितने भी श्रेष्ठ ग्रंथ हैं उन सभी का शुभारंभ व अक्षर से हुआ है रामचरितमानस, भागवत, रघुवंश आदि सभी का प्रथम अक्षर व ही है। व अमृत का बीज है इसलिए ग्रंथ कारों ने समझा कि कथा सुनाने के लिए सबसे पहले अमृत का पान करा दें। यह बातें व्यासपीठ की आसंदी से श्रीधाम अयोध्या पुरी निवासी अनंत विभूषित स्वामी रत्नेश प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने भागवत महापुराण की कथा का रसपान कराते हुए मठ महोत्सव के तृतीय दिवस श्रोताओं के समक्ष अभिव्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि- कथा लोक हितकारिणी होनी चाहिए, केवल व्यक्ति विशेष का हित करने वाला नहीं! श्रोताओं को कुसंग से बचने का सलाह दिया और कहा कि कुसंगति से व्यक्ति, समाज और परिवार का विनाश हो जाता है। श्री रामचरितमानस में लिखा है -दुष्ट संग जनि देहु विधाता। कैकेई ने मनथरा से कहा मैं तुझे रानी बना दूंगी! लेकिन वह उसे रानी नहीं बना पाई! स्वयं मैले- कुचैले वस्त्रों को पहन कर जमीन पर सो गई और मंथरा की तरह विधवा हो गई! कुसंगति से अच्छे से अच्छे व्यक्ति का विनाश हो जाता है! विद्वान आचार्य ने कहा कि संसार में चार पशु ऐसे हैं जो मनुष्य पर हंसते हैं कुत्ता, सुअर, ऊंट, और गधा! कुत्ता इसलिए हंसता है कि वह समझता है कि लडऩा- झगडऩा हमारा धर्म है किंतु मनुष्यों ने इसे अपना लिया। सुअर यह समझता है कि गंदी वस्तुओं को खाना हमारा धर्म है किंतु मनुष्य में खानपान की शुद्धता नहीं रह गई वह जो कुछ भी मिलता है खा जाता है। ऊंट इसलिए हंसता है की गर्दन उठाकर चलना उसका धर्म है लेकिन अब मनुष्य गर्दन उठाकर चलने लगा है और गधा इसलिए हंसता है कि बोझ ढोना उसका धर्म है किंतु अब मनुष्य संसार का भार सर पर उठाए फिरता है। क्रांतिकारी विचारक आचार्य ने कहा कि- परमात्मा ने आपको आकृति से मनुष्य बना दिया है आप प्रकृति से भी मनुष्य बन जाओ! आपके अंदर मनुष्यता आ जाए यही जीवन की सार्थकता है!
जीवन सभी को मिलता है लेकिन जीवन जीने का तरीका सब लोग प्राप्त नहीं कर पाते! आपकी जिंदगी कैसी रही? यह तो आप की मौत बताएगी! यदि मरते वक्त हरि नाम का स्मरण आ गया तो समझ लेना कि आपकी जिंदगी अच्छी रही और यदि संसार ही याद आता रहा तो समझ लेना कि आपका मनुष्य जीवन प्राप्त करना व्यर्थ चला गया! लोग पूछते हैं भगवान कैसे प्राप्त होंगे ? भगवान आपको क्षणभर में भी प्राप्त हो सकते हैं और वर्षों की तपस्या से भी नहीं! यह आपके द्वारा भगवान के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रेम पर निर्भर करता है! यदि ईश्वर को प्राप्त करने का उद्वेग आपके अंदर अत्यधिक है तो वह आपको शीघ्र से अति शीघ्र, क्षणभर में प्राप्त हो सकता है और नहीं तो आप वर्षों तक तपस्या करते रहेंगे तो भी ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो पाएगी! इसके लिए सच्चे लगन और प्रेम का होना नितांत आवश्यक है।
विद्वान आचार्य ने कहा कि धर्म पांडवों के पास भी था और कौरवों के पास भी! अंतर बस इतना है कि धर्मराज के रूप में धर्म पांडवों के आगे चलता था और विदुर के रूप में धर्म कौरवों के पीछे! याद रखना जिस दिन जीवन में धर्म का अपमान होगा उस दिन परिवार और समाज का विनाश निश्चित है। श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा का रसपान करने के लिए कार्यक्रम के आयोजक महामंडलेश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज हमेशा की तरह मंचासीन थे। कथा श्रवण करने के लिए पूर्व विधायक मोतीलाल देवांगन, छाया सांसद रवि शेखर भारद्वाज, जीव जंतु कल्याण बोर्ड के सदस्य नारायण खंडेलिया, श्रमिक कर्मकार मंडल के सदस्य हर प्रसाद साहू, कृष्ण कुमार पांडे, व्यास कश्यप, शिशिर द्विवेदी, संतोष शर्मा, मनोज मित्तल, शैलेश शर्मा ,संतोष गुप्ता, राजकुमार मिश्रा, किरण मिश्रा सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित हुए!