जांजगीर-चांपा। स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए साल भर पहले रसोई गैस सिलेंडर खरीदने के लिए राज्य सरकार ने राशि जारी की थी लेकिन आज तक गैस चूल्हा नहीं खरीदी की गई है। जिसकी वजह से स्कूलों में मध्यान्ह भोजन लकड़ी और कंडे से बन रहा है। जिले के 2361 स्कूलों में से केवल 46 स्कूलों में ही गैस चूल्हा का उपयोग किया जा रहा है। जबकि 2313 स्कूलों में लकड़ी और कंडा से मध्यान्ह भोजन बनाया जा रहा है।
स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए गैस चूल्हा खरीदने के लिए शासन द्वारा फंड जारी करने के बाद भी जिले के सिर्फ 46 स्कूलों में ही एलपीजी का उपयोग किया जा रहा है। जबकि बाकी जगहों में अब भी कंडों और लकड़ी से ही भोजन पकाया जा रहा है। जिला शिक्षा विभाग जांजगीर ने जो आकड़े विभाग के वेबसाइट में अपलोड किए हैं उसके हिसाब से जिले के 2361 स्कूलों में से केवल 46 स्कूल ऐसे हैं जहां गैस चूल्हा का उपयोग किया जा रहा है। जबकि 2313 स्कूलों में लकड़ी और कंडा से मध्यान्ह भोजन बनाया जा रहा है। जबकि इसी सत्र मार्च 2019 में ही शासन ने स्कूलों में एलपीजी की व्यवस्था के लिए 7 करोड़ 40 लाख रुपए की राशि जारी की है। इसके बावजूद विभागीय वेबसाइट में जिले में सिर्फ 46 स्कूलों में ही इसका उपयोग होना बताया जा रहा है। इसी तरह के हालात अन्य जिलों के भी हैं। इसके पूर्व शासन ने स्कूलों में धुआं रहित भोजन पकाने के लिए 2005-06 में गैस चूल्हा खरीदने के लिए राशि जारी की थी। वहीं, इसके दूसरे चरण में मार्च 2019 में राशि जारी की गई है, इसके बावजूद स्कूलों से एलपीजी सिलेंडर और चूह्ले दोनों ही गायब हैं।
स्कूलों में मध्या- भोजन पकाने के माध्यम के हिसाब से कुकिंग कॉस्ट में भी बढ़ोतरी की गई है। शासन ने एलपीजी से भोजन बनाने वाले समूहों को प्राथमिक स्कूलों में प्रति बधो के हिसाब से 20 पैसे और मिडिल स्कूल के प्रति बधाों के हिसाब से 40 पैसे अतिरिक्त देने का प्रावधान किया है। इसके बाद भी मध्यान्ह भोजन जिले के ज्यादातर स्कूलों में कंडे व लकड़ी से ही बन रहा है।
मध्यान्ह भोजन के लिए मिले गैस सिलेण्डर व चूल्हे का उपयोग पहली बार तो किया गया, मगर सिलेण्डर खाली होने के बाद रिफिलिंग की समस्या सामने आई। गांवों से इसके लिए एजेंसी तक आने-जाने की दूरी व समय पर सिलेण्डर नहीं मिलने के चलते इसका उपयोग बंद कर दिया गया। दूसरी ओर सरपंच भी स्कूलों के लिए सिलेण्डर का इंतजाम करने सक्रिय नहीं थे। ऐसे में यह योजना कारगर साबित नहीं हो सकी। अब ज्यादातर चूल्हा व सिलेण्डर का पता नहीं है। कही पूर्व सरपंच तो कही स्व सहायता के पदाधिकारी सिलेण्डर को दबाए बैठे हैं।
शासन स्तर से रायपुर में विभाग को गैस चूल्हा खरीदने के लिए राशि जारी की गई है। इसकी जानकारी नहीं है। जिला में गैस चूल्हा खरीदने के लिए किसी प्रकार की राशि नहीं आई है। वर्ष 2005-06 में कुछ स्कूलों को गैस चुल्हा का वितरण किया गया था। इसके बाद से चूल्हे की खरीदी नहीं हुई है।
शिवानंद राठौर
प्रभारी मध्यान्ह भोजन