
चंडीगढ़, २४ नवंबर । पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को उस समय झटका लगा है जब सुप्रीम कोर्ट ने जून महीने में पंजाब सरकार की ओर से बुलाए गए विधानसभा सत्र को वैध ठहराया है। सु्प्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए विस्तृत आदेश में कहा गया है कि सत्र की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब पंजाब सरकार को उन चार बिलों को फिर से विधानसभा के 28 नवंबर को शुरू होने वाले सत्र में पेश नहीं करेगी। काबिले गौर है कि पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के मौखिक आदेश के बाद बेशक विधानसभा के बजट सत्र का सत्रावसान करके नया सत्र बुला लिया था जिसको बुधवार को राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने मंजूरी दे दी थी लेकिन बिलों को लेकर राज्यपाल के साथ अभी पत्र व्यवहार शुरू नहीं किया था। गुरुवार को जब सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत आदेश आया तो यह राज्यपाल को एक बड़े झटके से कम नहीं था क्योंकि राज्यपाल सत्र को असंवैधानिक बताते रहे हैं और यह कहते रहे हैं कि असंवैधानिक सत्र में पारित किए गए बिल भी असंवैधानिक हैं। साफ है कि अब जब सुप्रीम कोर्ट ने सत्र को संवैधानिक बताया है तो जाहिर है कि इसमें पारित बिल भी संवैधानिक हैं और इन्हें नए सिरे से पेश करने की जरूरत नहीं होगी।सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्यपाल चुने हुए नुमाइंदे नहीं हैं । उन्हें अनिर्वाचित प्रमुख के तौर पर संविधान ने राज्य के प्रमुख के तौर पर शक्तियां दी हैँ लेकिन इन शक्तियों का उपयोग विधानसभा की ओर से पारित बिलों को विफल बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि संविधान की धारा 200 में बिल पर सहमत न हों तो वह उन्हें अपनी दलील देकर फिर से विचार करने के लिए लौटा सकते हैं । सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद अब राज्यपाल को उन चार बिलों पर अपनी सहमति देनी होगी जो जून महीने के विधानसभा सत्र में पारित किए गएथे। हालांकि इन बिलों पर अगर वह सहमत नहीं हैं तो वह बिल को पुर्नविचार के लिए भेज सकते हैं या फिर राष्ट्रपति के पास भी भेज सकते हैं।इन बिलों में पंजाब पुलिस पुलिस (संशोधन) बिल , 2023 और सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल, 2023 शामिल भी शामिल हैं । पुलिस संशोधन बिल के जरिए डीजीपी की स्थायी नियुक्ति के लिए हाई कोर्ट के जज की अगुवाई में बनने वाली कमेटी का गठन करना था । गुरुद्वारा संशोधन बिल के जरिए सरकार श्री दरबार साहिब से प्रसारित होने वाली गुरबाणी का प्रसारण निशुल्क करने के लिए लाया गया था। इसके अलावा पंजाब यूनिवर्सिटी बिल भी राज्यपाल के पास लंबित हैं जिसके जरिए यूनिवर्सिटी के चांसलर पद पर राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को लगाया जाना है।


























