अंबिकापुर /बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर ब्लाॅक से 20 किलोमीटर दूर बैकुंठपुर गांव में वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों ने 22 पंडो जनजाति के लोगों के मकान को उजाड़ दिया और तोड़फोड़ कर ध्वस्त कर दिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्होंने रिश्वत में वन विभाग के कर्मचारियों को बकरा मुर्गा नहीं दिया।

पंडो जनजाति के लोगों ने बताया कि 20 साल पहले वे वन जमीन पर काबिज हुए और खेती कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। काबिज करने से लेकर अब तक उनसे वन विभाग के कर्मचारी 10 बकरा और 15 से मुर्गा रिश्वत के रूप में ले चुके हैं। इस बार भी बकरा मांगा, नहीं देने पर मकान तोड़ दिया। विशेष पिछड़ी जनजाति परिवार बकरी और मुर्गी पालन करते हैं और यही उनकी आजीविका का साधन रहा है। पंडो जनजाति के अध्यक्ष उदय पंडो ने कहा पंडो जनजाति के पास रिश्वत देने पैसा नहीं होता है, इसलिए वन विभाग के लोग उनसे बकरा-मुर्गा लेते हैं।

इस बार मांग पूरी नहीं करने पर घर तोड़वा दिया है। इस पर पट्टा दिलाने और तोड़े गए मकानों को बनवाने और मकान तोड़ने व मारपीट करने वालों पर केस दर्ज करने मांग की गई है। बैकुंठपुर में करीब 40 एकड़ वन भूमि में 15-20 साल पहले से पंडो जनजाति के लोग जमीन पर काबिज हैं। दो साल पहले कच्चा मकान और झोपड़ी बनाकर यहां रह रहे थे। पंडो जनजाति के लोगों ने काबिज भूमि पर वन अधिकार पट्टा के लिए आवेदन भी दिया है, लेकिन उन्हें पट्टा नहीं मिला है।

पांच लोगों को पीटा: मकान और झोपड़ी टूटने के बाद भी वहीं रह रहे पंडो जनजाति के लोग
21 पंडो विशेष पिछड़ी जनजाति परिवार काबिज जमीन में घर बनाकर रह रहे हैं, जिसे 24 सितंबर को 2 बजे वन विभाग के कर्मचारियों ने तोड़ दिया और फारेस्टर सुरेश यादव ने वनकर्मियों के साथ मिलकर दिलबसो पंडो, अनिता पंडो, देवमुनि पंडो, जगेश्वर और मानसिंह के साथ मारपीट की। मकानों को तोड़ने के बाद पंडो परिवारों के पास रहने की समस्या खड़ी हो गई है। वहीं इसके बाद भी पंडो जनजाति के लोग वहीं रह रहे हैं।

फोन लूटकर मकानों को तोड़ा: वीडियो न बना लें, इसका डर, आए दिन होता है विवाद
पंडो ने बताया कि पहले वन कर्मियों ने उनके मोबाइल फोन ले लिए। इसके बाद झोपड़ी व मकान को उजाड़ा। इससे वे वनकर्मियों की करतूत का वीडियो नहीं बना सके। कहा जा रहा है पडोसी गांव के कुछ लोग पंडो जनजाति के लोगों द्वारा कब्जा कर वहां रहने के विरोध में हैं और उनके बीच इसे लेकर विवाद होता रहता है। पंडो जनजाति के लोगों ने तोड़फोड़ का विरोध करने पर मारपीट करने का भी आरोप लगाया है।

समझाइश के बाद हटाया कब्जा: पंडो की आड़ में दूसरे लोग कब्जा करना चाहते हैं
डीएफओ लक्ष्मण सिंह ने इस मामले में कहा है कि पंडो जनजाति के लोगों के साथ मारपीट नहीं की गई है। पंडो की आड़ में सामान्य वर्ग का आदमी वहां कब्जा करना चाहता है। किसी का मकान या झोपड़ी नहीं तोड़ा गया है। उन्होंने वन अधिकार का कोई आवेदन जमा नहीं किया है। उन्हें समझाइश के बाद कब्जा हटाया है। किसी से मुर्गा-बकरा नहीं लिया है।

वनकर्मियों ने इन पंडो के तोड़े हैं मकान
वन कर्मचारियों ने रामवृक्ष पंडो पिता मनबोध पंडो, जगदेव पंडो पिता बिरझन पंडो, कलेश्वर पंडो पिता रामनाथ पंडो, सहदेव पंडो पिता बिरझन पंडो, हरवंश पंडो पिता जवाहिर पंडो, रामसाय पंडो पिता मंगरू पंडो, रामेश्वर पंडो पिता मोहरलाल पंडो, तेजराम पंडो पिता रामदेव पंडो, ‌प्रेम कुमार पंडो पिता बालदेव पंडो, रामप्रित पंडो पिता जवाहिर पंडो, सूरजदेव पंडो पिता रामदेव पंडो, बासदेव पंडो पिता जवाहिर पंडो, रामधनी पंडो पिता रामदेव पंडो, रघुपति पंडो पिता रामदेव पंडो, रघुवंशी पंडो पिता रामदेव पंडो, रामलाल पंडो पिता रामधनी पंडो, देवशरण पंडो पिता रामसुंदर पंडो, मानसिंह पंडो पिता मुनेश्वर पंडो, जगेश्वर पंडो पिता मोहलाल पंडो, जयनाथ पंडो पिता रायफल पंडो, देवनारायण पंडो पिता राम औतार पंडो और रामजन्म पिता रामस्वरूप का मकान और झोपडी को तोड़ दिया।

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