जांजगीर-चाम्पा। प्रदेश सरकार द्वारा फसलों की सुरक्षा व किसानों की आय बढ़ाने की महत्वकांक्षी योजना पंचायत प्रतिनिधियों की लापरवाही की भेंट चढऩे लगी है। राज्य शासन द्वारा रोका-छेका कार्यक्रम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में घूम रहे मवेशियों की धरपकड़ कर उन्हें गोठानों में सुरक्षित रखा जाना है, मगर जिले में लगभग सभी गोठानों में मवेशियों के अभाव में सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां शासन द्वारा सभी पंचायतों में हजारों रूपये आबंटित भी किया जा रहा है, बावजूद इसके ग्रामीण क्षेत्रों की सडक़ों में बेसहारा मवेशी खुले में घूम रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार करने व उन्हें रोजगार से जोडऩे के लिए राज्य शासन द्वारा महत्वाकांक्षी योजना नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी योजना का शुभारंभ किया गया है। योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का मार्ग प्रशस्त होगा। गरूवा योजना के तहत सभी पंचायतों की शासकीय भूमि पर गोठान का निर्माण कराया जाना है ताकि यहां गायों को चारा, पानी की सुविधा मिल सके। साथ ही प्रदेश में खुली चराई को रोकने और फसलों की सुरक्षा के लिए गोठान की व्यवस्था को सशक्त बनाने, उनके रखरखाव और संचालन में भी इस राशि का उपयोग किया जाएगा। इसी तरह राज्य शासन द्वारा सभी गांवों में प्रभावी तरीके से रोका-छेका को लागू करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य कृषि के परंपरागत तरीकों को पुनर्जीवन देना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है। रोका-छेका को नई गोठान के निर्माण के साथ शुरू किया जा रहा है जिससे गाय के गोबर से बनी खाद का उत्पादन भी हो सकेगा। इन गोठानों के माध्यम से राज्य सरकार रोजगार के नए साधन भी मुहैया करा रही है। हालांकि विभाग द्वारा जिले के 150 गोठानों को प्रथम किश्त के रूप में प्रत्येक गोठान 40 हजार रूपए के मान से अनुदान राशि जारी की गई है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर परंपरागत रोका-छेका प्रथा को प्रभावी ढंग से लागू करने गोठानों के माध्यम से किसानों और पशुपालकों की मदद के लिए गांवों को यह राशि उपलब्ध कराई जा रही है, मगर विभागीय उदासीनता व गोठान समिति की मनमानी के चलते मवेशियों का जमावड़ा सडक़ों व गांव की गलियों पर लग रहा है। पूरे दिन मवेशी बारिश में सूखे जगह की तलाश में सडक़ों पर बैठे रहते हैं। जिसके चलते सडक़ों से होकर गुजरने वाले राहगीरों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यहां आए दिन राहगीरों व मवेशियों के बीच हुई भिड़ंत के चलते दोनों घायल हो रहे हैं, बाजवूद इसके गोठान समिति बेसहारा मवेशियों को गोठान में रखने के मामले में गंभीर नहीं हैं। अधिकांश गोठान मवेशियों के अभाव में सूने हैं।
बिना मवेशी के लाखों रूपये का पैरा बर्बाद
जिला प्रशासन द्वारा गोठानों में गायों के लिए अधिक से अधिक पैरादान करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यहां जिला प्रशासन के तत्वावधान में 10 दिसम्बर को जिले के सभी गोठान में पैरादान दिवस मनाया गया। साथ ही किसानों से गोठानों में रखे गए गायों के चारे की व्यवस्था के लिए निस्वार्थ भावना से पैरा दान करने की अपील भी की गई। अधिकारियों के आह्वान पर बड़ी संख्या में किसान स्वयं ट्रैक्टर व बीड़ा लेकर गोठान पहुंचे और पैरादान किया, जबकि अधिकांश पंचायतों द्वारा लगभग डेढ़ से दो लाख रूपये का पैरा ढुलाई का बिल प्रस्तुत कर रूपये आहरण भी कर लिया गया, जबकि प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत लाखों रूपये की पैरा ढुलाई के बाद भी यहां मवेशियों के अभाव में पैरा सडऩे लगा है। यहां प्रतिनिधियों व सचिवों के मनमाने रवैये के चलते राज्य शासन को लाखों रूपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। पंचायतों में लाखों रूपये खर्च होने के बाद भी मवेशी भूखे-प्यासे सडक़ों पर घूम रहे हैं।
रोका-छेका कार्यक्रम के तहत शपथ दिला कर निभाई गई औपचारिकता
राज्य शासन के निर्देश पर जिला प्रशासन द्वारा सभी पंचायतों में 19 जून को रोका छेका कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यहां सभी गोठानों में संबंधित अधिकारी व जनप्रतिनिधि बड़ी संख्या में पहुंचे और गोठानों में पौधरोपण कर लोगों को गायों की सुरक्षा व उन्हें गोठानों में रखने की शपथ दिलाई। विभागीय व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशी आज भी खुले में भूखे प्यासे घूम रहे हैं। वहीं सूखे की तलाश में सडक़ों पर बैठे वाहनों की चपेट में आकर घायल हो रहे हैं।
शासकीय अनुदानों पर ही पंचायतों की निगाहें
शासन द्वारा ग्रामीणों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सभी पंचायतों के खातों में मूलभूत राशि, 14वें वित्त की राशि सहित अन्य अनुदान में लाखों रूपये आबंटित किया जाता है, यहां पंचायतों में सरपंच, पंच सहित सचिवों की निगाहें शासन से मिलने वाले अनुदानों पर टिकी रहती है। जो तत्परता पंचायतों में रूपये आहरण को लेकर दिखाई जाती है यदि वही तत्परता जिस उद्देश्य के लिए शासन द्वारा अनुदान दिया गया है उसमें निष्ठा व इमानदारी से खर्च की जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधरने में वक्त नहीं लगेगा, मगर पंचायतों द्वारा हर साल लाखों रूपये अनुदान मिलने से पहले ही राशि को खर्च किए जाने का स्टीमेट तैयार हो जाता है। पंचायतों में लाखों रूपये अनुदान मिलने के बाद भी गोठानों के बाहर ताला लटक रहा है, वहीं मवेशी सडक़ों पर घूम रहे हैं।
इस संबंध में कांग्रेस नेता व किसान व्यास कश्यप का कहना है कि राज्य शासन द्वारा सभी गांवों में प्रभावी तरीके से रोका-छेका को लागू करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य कृषि के परंपरागत तरीकों को पुनर्जीवन देना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है। रोका-छेका को नई गोशालाओं के निर्माण के साथ शुरू किया जा रहा है जिससे गाय के गोबर से बनी खाद का उत्पादन भी हो सकेगा, मगर प्रशासन की लचर व्यवस्था के चलते योजना का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है और लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी मवेशी सडक़ों पर भूखे-प्यासे घूम रहे हैं। इसी तरह कृषक चेतना मंच के पदाधिकारी मेंहदा के किसान संदीप तिवारी का कहना है कि राज्य शासन द्वारा किसानों की फसलों की सुरक्षा व गोधन के सरंक्षण के लिए रोका-छेका कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, मगर विभागीय उदासीनता व पंचायत प्रतिनिधियों के मनमाने रवैये के चलते योजना का बेहतर ढंग से क्रियान्वयान नहीं हो पा रहा है। यहां मवेशी किसानों के खेतों में घुसकर फसल बर्बाद कर रहे हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
रोका-छेरा कार्यक्रम के तहत सभी पंचायतों में गायों को गोठानों में रखने का निर्देश दिया गया है। हालांकि कुछ किसानों के अनुसार छत्तीसगढ़ में हरेली के बाद से ही गायों को बांधने की परम्परा होने की बात कही जा रही है, मगर फिर भी मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी पंचायतों को फिर से निर्देश दिया जाएगा।
– तीर्थराज अग्रवाल, सीईओ, जिला पंचायत