आत्मा को तीर्थ क्षेत्रों के साथ स्पर्श कराती है रामचरित मानस

शिवरीनारायण। प्रपन्नाचार्य महाराज ने कहा कि भगवान की कथा परम पवित्र है। गंगा जी तीनों लोक को पवित्र करती है लेकिन जब यही गंगा संयोग से हरिद्वार, काशी या प्रयागराज को स्पर्श करती है तब इसकी महत्ता और अधिक बढ़ जाती है, वैसे ही भगवान की कथा अपने आप में परम पवित्र तो है लेकिन शिवरीनारायण जैसे तीर्थ स्थान को प्राप्त कर उसकी महत्ता और भी अनंत गुनी बढ़ जाती है। यहां कथा कहने और सुनने का आनंद ही कुछ और है। उन्होंने कहा कि किसी भी जीव में इतनी पात्रता नहीं है कि वह अपने प्रयत्न से मानव शरीर को प्राप्त कर सके। यह भगवान की करुणा का प्रतिफल है कि हमें मनुष्य का तन प्राप्त हुआ है। मानव जीवन प्राप्त करने का परम लाभ यह है कि हम इस शरीर से ईश्वर को प्राप्त कर लें! अन्यथा मानव का जीवन प्राप्त करना व्यर्थ ही चला जाएगा। ईश्वर को प्राप्त करने के अनेक साधन है लेकिन भक्ति से बढक़र कोई सरल साधन नहीं है। यहां भक्ति की अविरल धारा अपने आप प्रवाहित हो रही है। श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने लिखा है कि प्रथम भगति संतन कर संगा, दूसर रति मम् कथा प्रसंगा।। यह दोनों ही बहुत आसानी से इस स्थान पर आप सभी को सुलभ हो गया है। संसार की औषधि को खाना पड़ता है, पीना पड़ता है या इंजेक्शन के रूप में लगाना पड़ता है लेकिन रामचरितमानस भव रोग की एकमात्र ऐसी औषधि है जिसे सुनने मात्र से सभी रोग समाप्त हो जाते हैं। शिवरीनारायण मठ में संगीतमय श्री राम कथा के शुभारंभ के अवसर पर ही लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे। प्रथम सत्र की समाप्ति के पश्चात राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास महाराज ने सभी श्रद्धालु भक्तों से भगवान जगन्नाथ जी का प्रसाद ग्रहण करने अपील की। कथा का समय प्रत्येक दिन सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तथा अपराह्न 3 से शाम 6 बजे निर्धारित है।

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