
रिकांडो बायपास रोड पर चलना हुआ मुश्किल
कोरबा। अधिकार के दृष्टिकोण से सर्वशक्तिमान कहे जाने वाले नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल के आदेशों की औद्योगिक नगर कोरबा में एक तरह से पूछपरख है ही नहीं। एक ओर एनजीटी बिजली घरों से उत्सर्जित राखड़ के परिवहन और डम्पिंग को लेकर नियम कायदे जारी करता है और कुछ दिन के बाद फिर पुराना ढर्रा शुरू हो जाता है। कोरबा के रिकांडो बायपास रोड पर तस्वीर कुछ ऐसी ही है।
विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने में अभी समय है और हर कोई मौजूदा व्यवस्था का भरपूर लाभ ले लेना चाहता है। उन्हें मालूम है कि आगामी समय में पूरा कंट्रोल इलेक्शन कमीशन के हाथ में होगा और तब बहुत कुछ दिक्कतें हो सकती है इसलिए वर्तमान में सबको हरा-हरा सूझ रहा है। यही कारण है कि बिजली घरों से निकलने वाली खतरनाक राखड़ के सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन से लेकर डम्पिंग को लेकर पिछले दिनों जारी किये गए दिशा निर्देश और उस पर होने वाला अमल अब गायब हो गया है। लगातार विरोध और शिकायतों के कारण काफी समय तक राखड़ से लोड कैप्सूल और दूसरे वाहनों को रिहायशी क्षेत्र वाली सडक़ों पर नहीं देखा जा रहा था। वायु प्रदूषण से जुड़ी शिकायतें भी कम हो गई थी लेकिन अब बात ऐसी नहीं है। वर्तमान स्थिति में सीएसईबी, एनटीपीसी और बालको प्लांट से उत्सर्जित राखड़ को डम्प करने वाली पार्टियों ने खुलेआम मुख्य मार्गों और रिहायशी क्षेत्र पर केंद्रित रास्तों का उपयोग करना शुरू कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि कोरबा में जैन मंदिर बुधवारी बाजार से आगे रिकांडो बायपास रोड पर ऐसे वाहनों को दौड़ते देखा जा रहा है। नागरिकों की आपत्ति इस बात को लेकर है कि वाहनों से उडऩे वाली राख परेशानी का कारण बनी हुई है जबकि बायपास रोड में कई जगह इसका गुबार कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि रात के अंधेरे में राखड़ को आसपास के खाली गड्ढेनुमा स्थानों पर डम्प कर ट्रांसपोर्टर अपने फेरे की काफी दूरी बचा रहे हैं। इसके साथ ही उनका डीजल पर होने वाला खर्च बच रहा है लेकिन इन सबके चक्कर में जन स्वास्थ्य का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है।दादरखुर्द में खोला था मोर्चा
कुछ महीने पहले गैर जिम्मेदार तरीके से प्लांटों की राखड़ को यहां-वहां डम्प कर देने के चक्कर में अपेक्षाकृत सुरक्षित समझे जा रहे दादरखुर्द के नागरिकों ने मोर्चा खोल दिया था। दादर नाला पुल से लेकर बांस बाड़ी और नकटीखार रोड के किनारे राखड़ को गिराकर वाहन चालकों ने अपने कर्तव्य को पूरा करने का साहस दिखाया था। हवा के झोंकों के साथ यहां पर समस्या का विस्तार हुआ। नागरिकों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कई वाहनों के पहियों को न केवल पंक्चर किया बल्कि चालकों को सबक सिखाया। प्रशासन के पास यह मामला पहुंचा तब इस क्षेत्र को अवैध डंपिंग की श्रेणी से मुक्त किया गया।श्वसन, त्वचा जैसी बीमारियां घेर सकती है
प्रदूषणजन्य क्षेत्रों में जन स्वास्थ्य के सामने कई प्रकार की चुनौतियां उपस्थित होती हैं और लगातार इनके संपर्क में बने रहने का मतलब होता है कई बीमारियों को आमंत्रित करना। सामान्य तौर पर वायु प्रदूषण का घेरा जिन इलाकों में बहुत ज्यादा घनीभूत है वहां सबसे अधिक असर मानव के श्वसन तंत्र पर पड़ता है। फेफड़ों के साथ-साथ दमा और अस्थमा की बीमारियां उन्हें परेशान कर सकती है। ब्रोंकाइटिस, न्यूकोनिया के अलावा एलर्जी और त्वचा से जुड़े रोग लोगों को अपनी चपेट में ले सकते हैं। जरूरत इस बात की है कि जो लोग प्रदूषणजन्य क्षेत्रों में उपस्थित हैं वे मास्क लगाने के साथ अपने पूरे शरीर को ढंके। दवाओं से कहीं ज्यादा यह उपाय कारगर साबित होंगे।
-डॉ. दीपक राज, बीएमओ कोरबा
















