कश्मीर में बदलाव की शुरुआत…अलगाववादियों ने भी माना संसद ही सर्वोच्च है, वक्फ संशोधन विधेयक पर रखा अपना पक्ष

जम्मू, 2५ जनवरी ।
ऑल पार्टी हुर्रियत कान्फ्रेंस के चेयरमैन मीरवाइज मौलवी उमर फारूक और कट्टरपंथी अलगाववादी शिया नेता आगा सैयद हसन बडग़ामी शुक्रवार को नई दिल्ली में संसद भवन परिसर के सेंट्रल हाल में बैठे थे। आगा बडग़ामी को कट्टरपंथी सैयद अली शाह गिलानी का करीबी माना जाता रहा है।ये लोग वक्फ संशोधन विधेयक पर अपना पक्ष रखने के लिए पहुंचे थे। सामान्य नजर से देखा जाए तो इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है, लेकिन यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो कश्मीर में बदलाव विशेषकर अलगाववादी खेमे की धीरे-धीरे मुख्यधारा की तरफ बढ़ते कदमताल का एलान है।
अलगाववादी नेताओं की आज की मुलाकात बहुत कुछ कहती है। अलगाववादी भी समझ चुके हैं कि… संसद ही सर्वोच्च है। वर्ष 1989 के बाद यह पहला अवसर है, जब कश्मीर के किसी अलगाववादी नेता या मजहबी नेता ने संसद भवन परिसर में जाकर किसी प्रस्तावित कानून को लेकर अपना पक्ष रखा हो।1989 में कश्मीर में आतंकी हिंसा का दौर शुरू होने के बाद कश्मीर के हर छोटे-बड़े अलगाववादी और विभिन्न इस्लामिक संगठनों ने हमेशा संसद की ओर से पारित किए जाने वाले किसी भी कानून को लेकर या तो उसका मुखर विरोध किया या उससे पूरी तरह उदासीनता बनाए रखी। इन संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में कानून या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से खुद को हमेशा अलग रखा। वर्ष 2024 में हुए विधानसभा व लोकसभा चुनाव से पहले तक इन्होंने खुद को हर चुनाव से अलग रखा, बहिष्कार किया और चुनाव प्रक्रिया को हमेशा ढकोसला बताया, लेकिन अब बदलाव साफ नजर आ रहा है। यह बात अलग है कि मीरवाइज के नेतृत्व में गए चार सदस्यीय प्रतिपिधिमंडल ने जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को ज्ञापन सौंपकर कहा कि प्रस्तावित वक्फ अधिनियम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के मुस्लिमों को अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा, प्रस्तावित बिल वक्फ की स्वायत्तता को समाप्त कर देगा। भाजपा ने संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के उमर फारूक के फैसले की सराहना की। संसदीय समिति के सदस्य भाजपा सांसद संजय जायसवाल ने कहा, सबसे अच्छी बात यह रही कि उन्होंने अपनी बात मजबूती से रखी और विधेयक पर अपनी आपत्तियां व्यक्त करने के अपने संवैधानिक अधिकार का हवाला दिया।
कश्मीर मामलों के जानकार सैयद अमजद अली शाह ने कहा कि अलगाववादी खेमे को समझ आ गया है कि उसे जो भी मिलेगा वह पाकिस्तान या अमेरिका से नहीं बल्कि भारतीय संसद से ही मिलेगा।इससे पहले बीते 30 वर्ष के दौरान मीरवाइज उमर फारूक समेत अन्य अलगाववादी नेताओं की बयानबाजी और आज में बहुत अंतर है। आज की मुलाकात बहुत कुछ कहती है, बस समझने वाला चाहिए। जानकार बिलाल बशीर ने कहा, बीते कुछ समय से सुनने को मिल रहा था कि कश्मीर के कई प्रमुख अलगाववादी प्रत्यक्ष-परोक्ष तरीके से अलगाववाद से तौबा कर मुख्यधारा में शामिल होने का प्रयास कर रहे हैं। यह मुलाकात पांच अगस्त 2019 को शुरू हुई यात्रा (अनुच्छेद 370 हटने के बाद) एक शानदार पड़ाव पर पहुंचने का भी ऐलान है।

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