ताम्र पाषाण युग से रहा है कोरबा का रिश्ता, पुरातत्व विशेषज्ञ तलाश रहे संभावना

45 से अधिक चित्रों की खोज हुई इस सिलसिले में
कोरबा। बिजली, कोयला और एल्युमिनियम उत्पादन को लेकर प्रदेश और देश में कोरबा की पहचान बनी हुई है। इतना ही नहीं कोरबा जिले की गेवरा खदान को दुनिया की सबसे बड़ी खदान का दर्जा मिला हुआ है। यह तो हुई नई पहचान लेकिन किसी को भी यह जानकार हैरानी हो सकती है कि आदिकाल सभ्यता के चरण भी यहां पड़े। ताम्र पाषाण युग यानी मैसोलिथिक कालखंड से भी कोरबा का गहरा रिश्ता रहा है। हाल में ही 45 से ज्यादा शैलचित्र जिले में मिले हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है। जिला पुरातत्व संग्रहालय के प्रभारी और संस्कार भारती में प्राचीनकला विधा से जुड़े हुए हरिसिंह क्षत्री ने यह अनुसंधान किया है। कोरबा तहसील की बेला ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम दूधीटांगर क्षेत्र में ताम्रपाषाण युग की प्राचीन गुफा में यह शैल चित्र मिले। इनमें हिरण, सांभर, कुत्ता, बकरी, सियार के अलावा पदचिन्ह व मानव आकृति सहित जयमिती चित्र शामिल हैं। उन्होंने विश्व के जाने माने पुरातत्ववेत्ता केके मोहम्मद, कर्नाटक के रवि कोरीसेट्टार, वाकडक़र शोध संस्थान उज्जैन के पदाधिकारी विनिता देशपांडेय और स्थापत्यकला के विशेषज्ञ इंद्रनील बंकापुरे को वीडियो कॉल से जानकारी दी। विशेषज्ञ ने चित्रों को महत्वपूर्ण बताया और इनके डॉक्युमेंटेसन करने के निर्देश दिए।
लघु उपकरणों की खोज जरूरी
विशेषज्ञों ने कहा कि जिन इलाकों से यह चित्र प्राप्त हुए उनके आसपास लघु उपकरण हो सकते हैं इसलिए उनकी खोज की जानी चाहिए। कारण यह है कि खोज के दौरान माइक्रोलिथ मिला है। पद्मश्री केके मोहम्मद ने इन्हें ताम्रपाषाण युग यानी लगभग 4 हजार वर्ष पहले का होना बताया। हरि सिंह क्षत्रिय ने अब कि यह दूसरी गुफा तलाशी है। इससे पहले ग्राम पंचायत लेमरू के बढऩी में ऐसी खोज की गई थी। दोनों गांव के बीच 30 किमी का अंतर है, लेकिन चित्र समानता रखते हैं। बताया गया कि हसदेव घाटी की पुरातात्विक संपदा के नाम से प्रकाशित की जाने वाली पुस्तक में इन सभी चीजों का समावेश किया जा रहा है।

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