
जांजगीर-चांपा। पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं मिलने से छह रेत खदानों का लाइसेंस अधर में है। दिलचस्प बात यह है कि इन रेत घाटों में अवैध तरीके से आबाद गति से रेत निकाली जा रही है। वहीं खनिज अमला इन रेत खदान संचालकों के सामने बेबस नजर आ रही है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इनका कागजात अपडेट हो चुका है। बस लाइसेंस मिलने का इंतजार है। बावजूद रेत घाटों में धड़ल्ले से रेत का कारोबार हो रहा है। आपको बता दें कि जिले के कुदरी, नवागांव, घुठिया, बरबसपुर लछनपुर व पीथमपुर रेत घाट के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति अब तक नहीं मिल पाई है। इन रेत घाट के संचालकों ने छह माह भर पहले आवेदन किया था लेकिन लाइसेंस का प्रोसेस काफी कठिन होने से इन रेत घाट के संचालकों को लाइसेंस नहीं मिल पाया है। जबकि विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह हमारे बस की बात नहीं है। दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि विभागीय अधिकारियों को दूसरी ओर से जब पर्याप्त इनकम हो जा रहा है तो उन्हें टेंशन लेने की जरूरत ही नहीं है। क्योंकि ऐसा जिन जिन गांवों में रेत घाट संचालित है। उन उन गांवों में सरपंच ही खुद ठेकेदार बने बैठे हैं। बाकायदा पुराने अनुभवी रेत ठेकेदारों के द्वारा सरपंचों से साठगांठ कर लिया गया है और भले से अवैध रेत उत्खनन कर कारोबार किया जा रहा है। हद तो तब हो जाती है जब नेशनल हाइवे के नीचे जहां बड़े अफसर नेता गुजरते हैं उन्हें भी अवैध तरीके से रेत का उत्खनन निर्बाध ढंग से जारी रहता है। इन रेत घाटों से अवैध रूप से रेत नहीं निकाली जा रही है। यहां चौबीसों घंटे सैकड़ों ट्रिप रेत निकाली जा रही है। वहीं विभागीय अधिकारी केवल रास्तों में वाहनों को रोककर कार्रवाई की खाना पूर्ति कर लेती है। जबकि यही अधिकारी यदि रेत घाटों में जाकर कार्रवाई करते तो निश्चित ही बड़े ठेकेदार बेनकाब हो जाते। कुल मिलाकर अवैध रेत परिवहन का कारोबार अधिकारियों के लिए ऊपरी कमाई का प्रमुख जरिया बन गया है जहां वर्तमान जिला खनिज अधिकारी एवं उनके मातहत लोग इस रेट परिवहन के अवैध कारोबार में दोनों हाथ से लाभ ले रहे हैं।

















