पारिवारिक उपभोग के खर्च में कम होने लगी गांव और शहरों की दूरी, सरकारी प्रयास का दिखने लगा असर

नईदिल्ली, २६ फरवरी । देश के समग्र विकास को लेकर किए जा रहे सरकारी प्रयास का असर दिखने लगा है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय व राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाके में पारिवारिक उपभोग पर होने वाले खर्च में अधिक बढ़ोतरी हुई है। इसका नतीजा यह हुआ कि पारिवारिक उपभोग पर होने वाले मासिक खर्च में शहरों और गांवों के बीच के अंतर में कमी आने लगी है। ग्रामीण इलाके में खाने पर होने वाले खर्च में भी पहले के मुकाबले कमी आई है। सर्वे के मुताबिक वित्त वर्ष 2011-12 की तुलना में वित्त वर्ष 2022-23 में पारिवारिक उपभोग के मासिक खर्च में ग्रामीण इलाके में 164 प्रतिशत तो शहरी इलाके में 146 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2011-12 में ग्रामीण इलाके में पारिवारिक उपभोग पर एक परिवार का मासिक खर्च 1430 रुपए था जो 2022-23 में बढ़कर 3773 रुपए हो गया। शहर में यह खर्च वर्ष 2011-12 में 2630 रुपए था जो 2022-23 में 6459 रुपए हो गया। इस लिहाज से 2011-12 में ग्रामीण व शहरी इलाके के बीच परिवार पर होने वाले मासिक उपभोग खर्च में 84 प्रतिशत का अंतर था जो अब घटकर 71 प्रतिशत रह गया। वित्त वर्ष 2004-05 में यह अंतर 91 प्रतिशत तक पहुंच गया था।सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण इलाके में लोगों की आय में बढ़ोतरी हुई है, इसलिए अब पहले के मुकाबले उनके खाने के खर्च प्रतिशत में कमी आई है।वर्ष 1999-2000 में ग्रामीण इलाके में खाद्य पदार्थों पर कमाई का 60 प्रतिशत खर्च हो जाता था। 2011-12 में यह खर्च 53 प्रतिशत था जो 2022-23 में घटकर 46 प्रतिशत रह गया। खाने-पीने में ग्रामीण इलाके में अनाज पर होने वाले खर्च में कमी आ रही है। 2011-12 में 10.7 प्रतिशत खर्च अनाज पर हो रहा था जो घटकर पांच प्रतिशत रह गया है। मतलब अब ग्रामीण इलाके में लोग अनाज के साथ अन्य चीजों की भी खपत कर रहे हैं जो उनके विकास को दर्शाता है। शहरी घरों के मासिक उपभोग खर्च में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 2011-12 के 43 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 39 प्रतिशत हो गई है। शहरों में 2011-12 में छह प्रतिशत खर्च अनाज पर किया जाता था जो घटकर अब चार प्रतिशत हो गया है।

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