पेंटिंग एवं स्लोगन में झलकी विद्यालय की बालिकाओं का दर्द,दिया बालिकाओं की शिक्षा एवं संरक्षण का सशक्त संदेश

कोरबा। भारतीय समाज में बालिकाओं के सामने आने वाली असमानताओं के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है।साल 1966 में 24 जनवरी के दिन ही इंदिरा गांधी ने पहली महिला प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। देश में पहली महिला प्रधानमंत्री बनने को उपलब्धि मानते हुए ही 24 जनवरी के दिन को बालिका दिवस के रूप में चुना गया है।
इंडस पब्लिक स्कूल दीपका में राष्ट्रीय बालिका दिवस के उपलक्ष्य में अध्यनरत विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रकार के स्लोगन, पेंटिंग एवं निबंध लेखन के माध्यम से बालिका संरक्षण एवं बालिका शिक्षा का विशेष संदेश दिया। विद्यार्थियों ने अपनी पेंटिंग एवं स्लोगन के माध्यम से जागरूकता फैलाने का प्रयास किया ।उन्होंने लोगों को बताना चाहा कि बिना नारी के हम सृष्टि की कल्पना नहीं कर सकते ।हमें हर हाल में बालिकाओं की शिक्षा और संरक्षण पर विशेष जोर देना है ।बालिकाओं की अधिकांश पेंटिंग एवं स्लोगन कन्याओं की शिक्षा एवं संरक्षण का संदेश दे रही थी। विद्यार्थियों ने अपनी पेंटिंग एवं स्लोगन में दहेज प्रथा बाल विवाह एवं सती प्रथा को भी बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया।निबंध लेखन में भी विभिन्न कक्षा स्तर के विद्यार्थियों ने बालिका शिक्षा ,बालिका संरक्षण ,कन्या भ्रूण हत्या पर अपना आक्रोश व्यक्त किया। विद्यार्थियों ने अपने निबंध के माध्यम से सृष्टि में नारी का महत्व, बालिकाओं का महत्व, बालिकाओं की शिक्षा का महत्व पर विशेष जोर दिया।
इंडस पब्लिक स्कूल दीपका के प्राचार्य डॉक्टर संजय गुप्ता ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें बालक व बालिकाओं में भेद नहीं करना सिखाती है। भारतीय संस्कृति व सभ्यता में कुमारी कन्याओं को पवित्रता के मिसाल के तौर पर वंदना की जाती रही है। कुमारी भोजन उसका ही एक उदाहरण है। वहीं भारत में स्त्रियों को देवी तथा शक्ति स्वरूपा के तौर पर पूजा जाता रहा है। अत: भारतीय होने के नाते हमें महिलाओं के साथ साथ बालिकाओं के प्रति भी सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण इस बात को लेकर की बालिकाएं भी कुदरत की रचना है। जो इस सृष्टि में संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण व समान भूमिका अदा करती है। पिछले कुछ दशकों में कई कुप्रथाओं की वजह से लोगों में बालिकाओं को लेकर दृष्टिकोण बदल सा गया था लोग अपने घर पर बालिकाएं नहीं चाहते थे जिसके पीछे समाज की कुप्रथा जैसे दहेज प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा इत्यादि विभिन्न तरह के कुप्रथाओं की वजह से बालिकाओं का घर पर होना मन को नहीं भाता था परंतु पिछले एक दो दशकों में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला जब लडक़ों के साथ साथ लड़कियां भी स्कूलों में पढऩे लगी शिक्षा ग्रहण कर अपने अधिकार समझने लगी वही पढ़ लिख कर विभिन्न तरह के कार्य जो अब तक केवल पुरुषों के लिए सीमित थे। उनमें महिलाएं भी समान तौर पर सहभागिता निभाने लगी घर की चारदीवारी में कैद रहने वाली वही बच्चियां आज पढ़लिखकर उनमें से कोई इंजीनियर बन कर गगनचुंबी इमारत खड़ी कर रही है। तो कोई साइंटिस्ट बन कर नए नए अविष्कार कर रही है। वही कोई स्पोर्ट्स के फील्ड में नित नए कीर्तिमान हासिल कर रही है। तो कोई नर्स या डॉक्टरी के फील्ड में अपना नाम रोशन कर रही है। तो देखा जाए तो प्राय: हर क्षेत्र में बालिकाओं ने अपना परचम लहराया है। व माता पिता जिले राज्य देश का नाम रौशन किया है। जिन बच्चियों को अब तक घर की चारदीवारी के अंदर घर के कामकाज हेतु सीमित कर दिया गया था। जिससे उनकी क्षमताएं उनकी कौशलताएं बाहर प्रत्यक्ष नहीं हो पा रही थी। उनकी प्रतिभाएं दबी रह जा रही थी। पर जब से बच्चियां बाहर निकल कर पढऩें लगी तब से बौद्धिक विकास होने से उनके आंतरिक गुण उनकी प्रतिभा बाहर समाज में प्रत्यक्ष होने लगी और अगर गौर फरमाएं तो आज प्रत्येक फील्ड में बालिकाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। अपना लोहा मनवाया है। हमें बालक व बालिकाओं में फर्क ना करते हुए बालिकाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए समाज में हर फील्ड हर क्षेत्र हर जगह उन्हें आगे आने हेतु स्थान प्रदान करना चाहिए। अवसर प्रदान करना चाहिए। हमें बालिकाओं व महिलाओं के प्रति अपने विचारों में परिवर्तन करने की जरूरत है। व अपने विचारों को वृहद करने की जरूरत है। अपनी सोच को बढ़ा रखने की जरूरत है। समाज में स्त्री व पुरुष का संतुलन होना अत्यंत ही आवश्यक है। जिससे कि यह समाज आगे बढ़ता रहे कुछ दशकों पहले अवैध रूप से बालिकाओं को कोख में ही मार दिया जाता रहा था। ऐसी घटनाएं कितने ही राज्यों से आने लगी थी जोकि समाज में बालिकाओं के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न करने लगी थी पर जब से भारत सरकार ने अवैध गर्भपात पर सख्ती बरती तथा दहेज प्रथा पर अंकुश लगाएं साथ ही सती प्रथा इस तरह इत्यादि विभिन्न को प्रथाओं पर अंकुश लगाने से कुछ हद तक बच्चियों की सुरक्षा हो सके वही पहले बाल विवाह की प्रथा हुआ करती थी जिसमें नाबालिक उम्र की बालिकाओं का विवाह कर उनके मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक उत्थान को रोक दिया जाता था। उन्हें केवल एक वस्तु की तरह उपभोग के लिए समझा जाता था। इस तरह से उनके साथ अत्याचार किया जाता रहा पर इसमें भी परिवर्तन आज देखने को मिलता है। आज बच्चियों को लोग पढ़ाने पर अपना ध्यान फोकस कर रहे हैं। चाहे वह शहरी क्षेत्र हो या फिर ग्रामीण क्षेत्र हर जगह के परिजन आज जागरूक हुए हैं। और लडक़ों के साथ साथ लड़कियों को भी पढ़ाई करवाए जाने में प्राथमिकता दे रहे हैं। जो कि एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। फिर भी मजबूरी में कई ऐसे परिवार हैं। जो आज भी अपनी बच्चियों को पढ़ाई से वंचित रखने को मजबूर है। यह उनकी आर्थिक परिस्थिति की वजह से या फिर सामाजिक परिवेश की वजह से बंदी से नहीं तोड़ पा रहे हैं। हम समाज को इस विषय पर तनिक और अपना ध्यान आकर्षित करने की जरूरत है। कि बालक व बालिकाओं दोनों को समान दृष्टि से देखें न केवल बाहर बल्कि घर पर भी हर छोटी से छोटी चीजों में भी हम बालक बालिकाओं में भेद न करें प्राय: देखा जाता है। कि घर पर बच्चियों को कई छोटे-छोटे कार्यों को करने से महज इसलिए मना कर दिया जाता है। कि वह एक बालिका है। यह एक संकीर्ण सोच है। हमें अपनी सोच को विस्तार देने की जरूरत है। अपनी सोच को बढ़ा रखने की जरूरत है। की जो कार्य एक लडक़ा कर सकता है। वह हर कार्य एक लडक़ी भी कर सकती है। आज टीचिंग के क्षेत्र में, पत्रकारिता के क्षेत्र में, राजनीति के क्षेत्र में, डॉक्टरी हो या इंजीनियरिंग साइंटिस्ट हो या वकालत हर क्षेत्र में बालिकाओं ने अपना परचम लहराया है। व यह साबित कर दिया है, कि वह भी लडक़ों से या पुरुषों से कम नहीं यह समाज की ही नेगेटिव सोच थी जो आजतक उन्हें चार दिवारी में कैद कर रखा गया। उन्हें अवसर ही नहीं दिए गए आगे बढऩे के लिये। बिना अवसर दिए ही उन्हें कमजोर शक्तिहीन साबित कर दिया गया था। पर अपने दृण संकल्पों के मद्देनजर आज बालिकाओं ने उच्च विचारधारा का खंडन करते हुवे हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर यह साबित कर दिया कि उनकी भी अहमियत उतनी ही जरूरी है।

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