महाराष्ट्र में चुनाव नजदीक; लेकिन सीटों पर तकरार नहीं हो रही खत्म; उद्धव ठाकरे और कांग्रेस को लेने होंगे कड़े फैसले

मुंबई। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे पर शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस के बीच हो रही तकरार उस बेमेल गठबंधन का कुफल है, जो 2019 में विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद हुआ था। ये बेमेल गठबंधन अविभाजित शिवसेना का कांग्रेस और राकांपा के साथ हुआ और एक साल बाद राकांपा (अजीत) का भाजपा एवं शिवसेना (शिंदे) के साथ भी हुआ।
2019 में जब उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद पाने के लिए अपने दल शिवसेना का गठबंधन कांग्रेस और राकांपा के साथ किया, तभी ये आशंका जताई जाने लगी थी कि एक-दूसरे से लड़कर आए ये दल भविष्य में एक साथ कैसे चल पाएंगे, क्योंकि 30 साल से महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा का गठबंधन चलता आ रहा था और पिछले 20 साल से राकांपा और कांग्रेस भी सत्ता में साथ-साथ ही रहते आए थे।
1999 में शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी भले अलग बना ली थी। उन्होंने चुनाव भी कांग्रेस से अलग लड़ा था। लेकिन चुनाव के बाद सरकार उन्होंने कांग्रेस के साथ ही बनाई थी। तबसे 2014 तक राज्य में कांग्रेस-राकांपा की ही सरकार रही थी। वैचारिक धरातल पर भी वह कांग्रेस से अलग नहीं थे। लेकिन शिवसेना का राकांपा और कांग्रेस के साथ जाना न तो शिवसेना के अधिसंख्य मतदाताओं को पसंद आया था न ही उसके ज्यादातर विधायकों को, क्योंकि वे भाजपा के साथ गठबंधन कर कांग्रेस या राकांपा के विरुद्ध चुनाव लड़े थे।

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