
नई दिल्ली। संसद में सेंगोल के प्रदर्शन पर सपा, कांग्रेस, राजद समेत कई विपक्षी दलों ने कड़ा एतराज जताते हुए इसे सेंगोल बनाम संविधान की लड़ाई बना दिया और राजतंत्र का प्रतीक करार दिया। जबकि सत्तारूढ़ भाजपा ने समूचे राजग ने इस मामले में विपक्षी दलों पर पलटवार करते हुए कहा कि सपा और अन्य विपक्षी दल भारतीय और तमिल संस्कृति का सम्मान नहीं करते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान सेंगोल (पवित्र छड़ी) के प्रदर्शन पर गुरुवार को विपक्षी दलों ने एतराज जताया और कहा है कि यह राजशाही का प्रतीक है। ऐसे में इसे हटाकर उसकी जगह संविधान की प्रति लगाई जाए। इस मुद्दे को सपा सांसद आरके चौधरी ने सबसे पहले उठाया और इसे लेकर लोकसभा अध्यक्ष को एक चिट्ठी भी लिखी। आरके चौधरी ने संसद में सेंगोल की मौजूदगी को राजतंत्र का प्रतीक बताया। क्या अब देश संविधान से नहीं चलेगा, क्या यह अब राजदंड या ‘राजा के डंडे’ से चलेगा। हालांकि इसके बाद राजद सदस्य मीसा भारती ने भी उनकी मांग का समर्थन किया और कहा कि इसे बिल्कुल हटाया जाना चाहिए। यह और बात है कि बाद में अखिलेश यादव ने अपनी ही पार्टी के चौधरी के बयान पर कुछ अलग तरीके से प्रतिक्रिया दी। और कहा कि सेंगोल के आगे प्रधानमंत्री मोदी ने शीश नवाए थे, लेकिन शपथ ग्रहण के समय प्रणाम नहीं किया। लगता है चौधरी भी प्रधानमंत्री को इसी बात की याद दिला रहे थे। वहीं, कांग्रेस सदस्य माणिक टैगोर ने भी चौधरी की बातों का समर्थन करते हुए सरकार के संसद के विशेष सत्र में ‘नाटक’ करने की आलोचना की है। वहीं, भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सेंगोल पर सपा के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि वह भारतीय और तमिल संस्कृति का आदर नहीं करते हैं। सेंगोल का संसद में विरोध कर सपा उसे राजा का दंड बता रही है। अगर ऐसा है तो जवाहर लाल नेहरु ने इसे स्वीकार क्यों किया था।






















