
जांजगीर चापा। एक पुरानी कहावत है कि सत्य परेशान हो सकता हैं लेकिन पराजित नहीं। इस कहावत को चरितार्थ किया हैं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जांजगीर शैलेन्द्र चौहान के दिनांक 29 अगस्त 2024 को दिए गए फैसले ने। आज से ठीक बारह वर्ष पूर्व एसीबी ने नगर के सर्जन डॉ. आर. के. चन्द्रा के निवास पर छापामार कार्यवाही करते हुए उनके विरुध्द अनुपातहीन संपति का मामला दर्ज करते हुए न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किया था जिसमें देर से ही सही अंतत: न्याय तथा सत्य की जीत हुई हैं। आज से बारह वर्ष पूर्व सन 2012 के इस प्रकरण में नगर के परशुराम चौक के पास निवासीसर्जन डॉ. राजेश चन्द्रा पर कार्यवाही करते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर ने उनके खिलाफ अनुपातहीन संपति का प्रकरण कायम किया था। इस दौरान डॉ. चन्द्रा सर्जरी विषेशज्ञ मालखरौदा के पद पर पदस्थ थे। इस समय उन्होंने ऐच्छिक सेवानिवृत्ति का विभाग को नोटिस दिया था जिसकी अवधि 23 जून 2012 को पूर्ण हो चुकी थी। लेकिन इसके बाद भी उनके नगर के आवास पर 26 जून 2012 को एसीबी ने छापामार कार्यवाही कर प्रकरण कायम किया था। मामले की विस्तृत जांच के बाद विवेचना अधिकारी बिलासपुर तथा एस.पी. एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर ने डॉ. चन्द्रा के खिलाफ अनुपातहीन संपति ना पाते हुए इस प्रकरण को तथा होता की उन्हे खात्मा स्वीकार कर लिया गया। उल्लेखनीय है कि डॉ. राजेश चन्द्रा अपनी शासकीय सेवा के दौरान कभी भी किसी प्रशासनिक वित्तीय अधिकार के पदो पर पदस्थ नहीं रहे।
ऐसे में उनके द्वारा भ्रष्टाचार कर अनुपातहीन संपति अर्जित करने का सवाल ही नही पैदा हैं। उन्हें प्राइवेट प्रेक्टिस करने छुट मिली हुई थी। इसके अलावा दूरबीन नसबंदी ऑपरेशन का भी शासन द्वारा भुगतान किया जाता था और उनकी चिकित्सक पत्नी का अगस्त 2024 में माननीय न्यायालय द्वारा अनुपातहीन संपति न पाए जाने पर तथा विभिन्न हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के फैसलो का उदाहरण देते हुए डॉ. आर. के. चन्द्रा के विरुध्द कायम अनुपातहीन संपति के इस प्रकरण में भी नगर में स्वयं का हॉस्पिटल एवं उनके पुत्र का भी व्यवसाय हैं।
सभी लोग अपनी आय पर नियमित आयकर का भुगतान करते हैं। दरअसल पुरा मामला प्रायोजित था जिसकी वजह से डॉ. आर. के. चन्द्रा जैसे वरिष्ठ और एल.टी.टी. सर्जन को मालखरौदा जैसी जगह पर पोस्ट करके उनके खिलाफ छापामार कार्यवाही की गई। सूत्रों के अनुसार अपनी शासकीय सेवा के दौरान विभागीय भ्रष्टाचार को समय-समय पर उजागर करने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और अपमानित होना पड़ा हैं। परंतु देर से ही सही उन्हें बारह वर्ष बाद आखिरकार न्याय मिला जिससे अंतत: सत्य की जीत माना जा रहा हैं। संभवत: जिले का यह पहला मामला हैं जिसमें न्यायालय द्वारा खात्मा स्वीकार किया हैं।

























