
जांजगीर-चांपा। मुख्य मार्ग चंपा रोड डॉ आर के प्रसाद के निवास पर आयोजित श्रीमद् भागवत में पंडित श्री कृष्ण चंद्र जी शास्त्री ने अपने पीठ से कहा कि भगवान को भक्त जिस रूप में देखना चाह उन्हें इस रूप में दिखाई देता है यह केवल व्यक्ति के भावना के ऊपर निर्भर करता है । कृष्ण जन्म उत्सव का कथा सुनाते हुए पंडित कृष्ण चंद्र शास्त्री ने कहा कि जब भगवान कृष्ण गोकुल से मथुरा आए तो गोकुल वासियों की आंखों में विरह के आंसू छलक रहे थे वही मन में वियोग का भाव समाहित था । शास्त्रीय ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने पापों के नाश के लिए इस धरती में जन्म लिए थे उन्होंने केवल कंस को ही नहीं बल्कि पूतना,जरासंध,सहित अनेक राक्षसों को मारकर उन्होंने जनता को राहत देने का कार्य किया था। उन्होंने कहा कि जब-जब यह धरती पर पाप बड़ा है भगवान किसी न किसी रूप में जरूर अवतार लेते रहें हैं।श्री कृष्ण जन्म भी इसी का एक हिस्सा है जहां भगवान नारायण कृष्ण के रूप में जन्म लेकर कंस का मर्दन करते हैं उन्होंने कहा कि कि भगवान जन्म लेने के साथ अनेक ऐसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं जिन्हें याद कर हमें अपने जीवन में अनुसरण करना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरु को गुरु दान के रूप में उनके मृत्यु बालक को जिंदा कर उन्हें उपलब्ध कराया। जब कृष्ण के गुरु के पुत्र का निधन हो गया था तो उन्होंने। काल से भी उनके पुत्र को ले आया और जिंदा कर दिए उन्हें खुशियां लौटाया। ईश्वर भाव के भूखे होते हैं उन्हें जिस रूप में देखा जाए इस रूप में भगवान दिखाई देते हैं । कृष्ण जब गोकुल से मथुरा आए उस समय भगवान की उम्र 11 वर्ष 58 दिन था जिन्हें देखने के लिए मथुरा की तमाम नागरिक उम्र पड़े थे और उसे समय प्रत्येक नागरिक जिस भाव में देखना चाहते उन्हें भगवान इस रुपए दिखाई दे रहा था। डॉ आरके प्रसाद के निवास में आयोजित इस श्रीमद् भागवत में पंडित कृष्ण चंद्र जी ने कहा कि रुक्मणी और कृष्ण का विवाह भी एक अलौकिक है जिन्हें रुक्मणीने भगवान को बिना देखे ही पसंद करने लगी थी । जब रुक्मणी का बड़ा भाई शिशुपाल से रुक्मणी का विवाह तय कर दिया था उसे समय रुक्मणी ने मार्मिक पत्र लिखकर श्री कृष्ण को स्वयंवर में पहुंचने के लिए अनुरोध किया था तब भगवान ने वहां पहुंचकर रुक्मणी के गले में वरमाला डालें और वहां से रुक्मणी को लेकर चले गए। इस तरह भगवान और रुक्मणी का विवाह संपन्न हुआ।






















