
जिनेवा, १३ सितम्बर ।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूर्वी लद्दाख में सीमा मुद्दे पर कहा कि सैनिकों की वापसी से संबंधित मुद्दे लगभग 75 प्रतिशत तक सुलझ गए हैं लेकिन बड़ा मुद्दा सीमा पर बढ़ते सैन्यीकरण का है। जिनेवा में थिंकटैंक के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जून 2020 में गलवन घाटी में हुए टकराव ने भारत-चीन संबंधों को समग्र रूप से प्रभावित किया। कोई भी सीमा पर हिंसा के बाद यह नहीं कह सकता कि बाकी संबंध इससे अछूते हैं। उधर, गुरुवार को ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने सेंट पीटर्सबर्ग में चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ वार्ता की। इस दौरान सीमा पर लंबे समय से जारी गतिरोध के शीघ्र समाधान पर फोकस रहा। दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले शेष स्थानों से सैनिकों को पूरी तरह से पीछे हटाने के लिए तत्परता से काम करने और प्रयासों को बढ़ाने पर सहमति जताई। जयशंकर ने कहा कि विवादित मुद्दों का समाधान ढूंढऩे के लिए दोनों पक्षों में बातचीत चल रही है। हमने कुछ प्रगति की है। मोटे तौर पर सैनिकों की वापसी संबंधी करीब तीन-चौथाई मुद्दों का हल निकाल लिया गया है। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि हम दोनों ने अपनी सेनाओं को एक-दूसरे के करीब ला दिया है और इस लिहाज से सीमा का सैन्यीकरण हो रहा है। भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख में कुछ टकराव वाले बिंदुओं पर गतिरोध बना हुआ है। भारत कहता रहा है कि जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति नहीं होगी, चीन के साथ संबंध सामान्य नहीं हो सकते। जयशंकर ने कहा कि 2020 में जो कुछ हुआ, वह कुछ कारणों से कई समझौतों का उल्लंघन था जो अभी भी हमारे लिए पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात किया और स्वाभाविक रूप से जवाबी तौर पर हमने भी अपने सैनिकों को भेजा। रूस और यूक्रेन की सहमति के बिना शांति वार्ता संभव नहीं जयशंकर ने कहा कि भारत उन कुछ देशों में से है जो रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत कर युद्ध के मैदान के बाहर समाधान निकालने की क्षमता रखते हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि दोनों पक्षों की सहमति के बिना बातचीत नहीं हो सकती। उन्होंने दोनों के बीच वार्ता की टेबल पर समाधान करने के भारत के घोषित रुख को दोहराया।
विदेश मंत्री ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ब्रिक्स नामक एक और क्लब की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर जी-20 के रहते जी-7 अस्तित्व में रह सकता है तो फिर कोई कारण नहीं है कि ब्रिक्स न हो। वैश्विक जीडीपी में 27 की हिस्सेदारी रखने वाले ब्रिक्स की स्थापना ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने की थी।एस जयशंकर ने कहा कि बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हो गया और जनवरी 2024 में पांच नए देश ईरान, सऊदी अरब, मिस्त्र, यूएई और इथियोपिया इसमें शामिल हुए। जयशंकर ने कहा कि क्लब क्यों। क्योंकि एक और क्लब था। इसे जी7 कहा जाता था और आप किसी और को उस क्लब में शामिल नहीं होने देंगे। इसलिए, हमने जाकर अपना खुद का क्लब बनाया।















