
जांजगीर-चांपा। जिले के प्राथमिक से लेकर मिडिल स्कूलों में शाला विकास समिति का गठन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि स्कूलों की समुचित रुप से पढ़ाई के अलावा कामकाज के संबंध में भी जानकारी हो सके। समिति की बैठक माह में कम से कम एक बार आयोजित किया जाना है, लेकिन बनाई गई समिति केवल कागजों में ही चल रही है। यहां तक की बनाई गई समिति के सदस्यों को योजनाओं के संबंध में भी जानकारी नहीं है।
गौरतलब है कि नि:शुल्क और बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शाला विकास समिति का गठन किया गया है। इन समितियों में 75 प्रतिशत सदस्य विद्यार्थियों के माता-पिता होते है। 25 प्रतिशत सदस्यों में से एक तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के निर्वाचित सदस्य होते है, वहीं तो तिहाई सदस्य स्कूल के शिक्षक होते है। गांवों के शिक्षाविद एवं पूर्व विद्यार्थियों को मिलाकर समिति का गठन किया जाना है, ताकि स्कूल में पढ़ाई व्यवस्था से लेकर स्कूल के बजट रंग-रोगन एवं पढ़ाने वाले शिक्षकों पर पढ़ाई संबंधी पूरी नजर रखी जा सके, लेकिन इसके विपरीत स्कूलों में बनाई गई समिति का कहीं कोई कार्य विधि नजर नहीं हा रहा है। अविभाजित जिले में 15 सौ से अधिक प्रायमरी स्कूल और 9 सौ से अधिक मीडिल स्कूल संचालित है। स्कूलों में बनाई गई समितियां उपयोगी साबित नहीं हो पा रही है, न तो समिति की बैठक हो पाती है और ना ही समितियां स्कूलों की मनमानी पर नियंत्रण रख पाती है।
ऐसे में बैठक की कार्रवाई रजिस्टर में अंकित किया जाना रहता है, ताकि गांव के आम लोगों को बैठक में लिए गए निर्णय के संबंध में आम लोगों को जानकारी हो सके। स्कूलों में बैठकों की खानापूर्ति की जाती है एवं बनाए गए रजिस्टर को घरों में ले जाकर सदस्यों से दस्तखत कराकर इसकी औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।
























