
देहरादून। उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा किस वजह से आई, इसे लेकर तो जांच पड़ताल के बाद ही तस्वीर साफ होगी, लेकिन इस घटना के बाद उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे का विषय फिर से चर्चा के केंद्र में है। राज्य में लगभग 1266 ग्लेशियर झीले हैं। यद्यपि, ऐसी झीलों की बड़ी तादाद हैं, जो विभिन्न कारणों से टूटती बनती रहती हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र की यह झीलें कभी भी बड़े खतरे का सबब बन सकती हैं। एनडीएमए (नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी) ने उत्तराखंड में ऐसी 13 ग्लेश्यिर झीलें चिह्नित की हैं, जो खतरनाक हैं। इनमें भी पांच को जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।
यद्यपि, इनमें से चमोली जिले में वसुधारा ताल का अध्ययन किया जा चुका है और अब पिथौरागढ़ की झीलों का अध्ययन कराने की तैयारी है। इस बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए हैं। इस कड़ी में शासन अब वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान को ग्लेशियर झीलों की डीपीआर तैयार करने का जिम्मा सौंपने जा रहा है। दरअसल, ग्लेशियर झीलों का विषय जून 2013 में आए केदारनाथ जलप्रलय के बाद चर्चा के केंद्र में आया। केदारनाथ के ठीक ऊपर चौराबाड़ी ग्लेशियर की झील फटने से यह तबाई आई थी। इसके बाद उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित ग्लेशियर झीलों पर नजर रखने के साथ ही इनसे बचाव के दृष्टिगत अध्ययन कराने की दिशा में कदम बढ़ाए गए। इस लिहाज से उत्तराखंड की तस्वीर देखें तो यह बेहद संवेदनशील है।























