
कृष्ण विभूति तिवारी
कोरिया बैकुंठपुर। कोरिया जिले के सरकारी और निजी स्कूलों में पढऩे वाले छोटे-छोटे बच्चे आज शिक्षा का असली बोझ अपने कंधों पर ढो रहे हैं। जिले के अधिकांश स्कूलों में छात्रों के स्कूल बैग का वजन 8 से 10 किलो तक पहुंच चुका है। स्थिति यह है कि बच्चे भारी बैग के कारण झुककर चलते हैं और कई बार थकावट के चलते स्कूल पहुंचने से पहले ही परेशान हो जाते हैं।
हालांकि स्कूलों की ओर से समय-सारणी (टाइम टेबल) निर्धारित की गई है, लेकिन व्यावहारिक रूप से सभी विषयों की किताबें, नोटबुक्स और अन्य स्टडी मटेरियल रोजाना लाने की बाध्यता बच्चों के बोझ को कई गुना बढ़ा देती है। विशेष रूप से प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे इस भारी बोझ को उठाने में सबसे अधिक परेशान हैं। कई छात्र 5 से 7 किलोमीटर की दूरी तय कर स्कूल पहुंचते हैं, जिससे उनकी शारीरिक थकावट और बढ़ जाती है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के बैग का वजन उनके शरीर के वजन का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन कोरिया जिले के स्कूलों में यह सीमा कई गुना पार हो रही है। स्कूलों में लॉकर सिस्टम, विषयवार बुक विभाजन, डिजिटल अध्ययन सामग्री और गृहकार्य की संतुलित योजना से इस समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। शिक्षा विभाग और स्कूल प्रबंधन को इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि बच्चे शिक्षा का बोझ नहीं बल्कि उसका आनंद लेकर आगे बढ़ सकें।
क्लास के हिसाब से निश्चित है बैग का वजन
एनसीईआरटी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय की गाइडलाइन के मुताबिक
कक्षा 1 से 2 तक के बच्चों का बैग 1.5 से 2.5 किलोग्राम,
कक्षा 3 से 5 तक 2 से 4 किलोग्राम,
कक्षा 6 से 7 तक 4 से 5 किलोग्राम,
कक्षा 8 से 9 तक 5 से 5.5 किलोग्राम,
और कक्षा 10 तक के लिए अधिकतम 5.5 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए।
बेग के बोझ से शरीर पर असर
बच्चों पर ज्यादा वजन का असर केवल उनकी रीढ़ की हड्डी पर ही नहीं पड़ता, बल्कि इससे पोश्चर बिगडऩा, मांसपेशियों में खिंचाव, गर्दन व कंधों में दर्द, थकान और सांस लेने में कठिनाई जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। वही ज्यादातर मामलों में अधिक वजन ढोने से थके बच्चे अध्ययन में भी रुचि नहीं दिखाते।























