
कोरिया। कोरिया जिले के वन विभाग में इन दिनों हालात असामान्य बने हुए हैं। विभागीय नियमों और प्रशासनिक आदेशों को दरकिनार कर रात के अंधेरे में सरकारी भवन को जेसीबी से गिराए जाने का मामला सामने आया है। इस घटना के बाद विभागीय अनुशासन, जवाबदेही और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के अनुसार, नवीन डीएफओ कार्यालय के निर्माण के लिए पुराने परिसर में स्थित सरकारी ड्राइवर कक्ष को बाधा बताया जा रहा था। इसे हटाने के लिए न तो निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई और न ही दिन के उजाले में कार्रवाई की गई। आरोप है कि रेंजर भगन राम ने बिना उच्च स्तरीय अनुमति के रात के समय जेसीबी लगवाकर भवन को जमींदोज करा दिया। जब इस पूरे मामले पर जिला वनाधिकारी (ष्ठस्नह्र) से सवाल किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने रात में भवन गिराने के कोई निर्देश नहीं दिए थे। डीएफओ के इस बयान के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या एक रेंजर अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेशों की अवहेलना कर मनमानी कार्रवाई कर सकता है। विभागीय हलकों में चर्चा है कि क्या रेंजर का प्रभाव डीएफओ से भी अधिक हो गया है। इस मामले को और संवेदनशील बनाता है यह तथ्य कि कोरिया जिले का वर्तमान डीएफओ कार्यालय वर्ष 1948 से अस्तित्व में है। करीब सात दशक पुराना यह भवन आज भी सुरक्षित और उपयोग योग्य स्थिति में बताया जा रहा है। इसके बावजूद नए कार्यालय के निर्माण के नाम पर पुराने ढांचों को जल्दबाजी में गिराने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। क्या नए कार्यालय के नाम पर सरकारी बजट के दोहन की तैयारी है। जब कार्यालय के लिए अन्य स्थान प्रस्तावित था, तो उसी परिसर के आसपास निर्माण की जिद क्यों की जा रही है। सरकारी भवन गिराने से पहले डिस्पोजल या नीलामी की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई। रात के अंधेरे में जेसीबी चलाने की मजबूरी और इसकी अनुमति को लेकर रेंजर की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब सामने नहीं आया है। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन ऐसे रेंजर के खिलाफ कार्रवाई करेगा, जिसने कथित तौर पर न केवल सरकारी संपत्ति को नियमों के विरुद्ध नुकसान पहुंचाया, बल्कि अपने वरिष्ठ अधिकारी की गरिमा और विभागीय अनुशासन को भी चुनौती दी है।
























