
कोरिया बैकुंठपुर। प्रदेश में भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल के दौरान कोरिया और वर्तमान मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले की प्रशासनिक स्थिति को लेकर स्थानीय अखबारों में कई बार तीखे व्यंग्य और चुटीले शीर्षक देखने को मिले। ‘मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन खोजने निकले कलेक्टर ‘, ‘विधानसभा में गरजे कलेक्टर’ और ‘मुख्यमंत्री से कलेक्टर की शिकायत करने पहुंचे’ जैसे शीर्षक उस दौर की प्रशासनिक अस्थिरता को बखूबी दर्शाते थे।
आंकड़ों पर नजर डालें तो पांच वर्षों के कार्यकाल में कोरिया जिले में कुल छह कलेक्टरों की पदस्थापना हुई। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि किसी भी कलेक्टर को औसतन एक वर्ष से भी कम समय जिले में काम करने का अवसर मिला। यही स्थिति अन्य कई विभागों में भी देखने को मिली, जहां अधिकारी ‘आया राम-गया राम’ की तर्ज पर बदलते रहे। प्रशासनिक निरंतरता के अभाव का खामियाजा सीधे विकास कार्यों और योजनाओं के क्रियान्वयन पर पड़ा। प्रशासनिक अस्थिरता के पीछे सबसे बड़ा कारण उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को माना जाता है। चर्चा रही कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने विधायकों को संतुष्ट रखने के लिए उन्हें काफी हद तक खुली छूट दे रखी थी। परिणामस्वरूप कई बार प्रशासनिक निर्णय राजनीतिक दबाव में प्रभावित हुए और अधिकारी टिक नहीं पाए। इसके उलट वर्तमान समय की स्थिति पर नजर डालें तो जिले के मौजूदा कलेक्टर पिछले ढाई वर्षों से जिले में पदस्थ हैं। नए जिले के गठन के बाद बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई कठोर और अलोकप्रिय निर्णय भी लिए गए हैं। सडक़ों, कार्यालयों और प्रशासनिक ढांचे में तोड़-फोड़ और पुनर्निर्माण जैसी गतिविधियां आमजन को भले ही असहज लगें, लेकिन इसे जिले के दीर्घकालिक विकास के लिए आवश्यक बताया जा रहा है। खास बात यह है कि उनकी ईमानदारी पर अब तक कोई गंभीर सवाल नहीं उठा है। हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि मौजूदा कलेक्टर राजनीति को पूरी तरह नजरअंदाज करने की नीति पर चल रहे हैं। यही कारण है कि कुछ जनप्रतिनिधियों और संगठनों में असंतोष देखा जा रहा है। हाल के दिनों में कलेक्टर घेराव की चर्चाएं भी सामने आईं, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसका हश्र वही होगा जो पूर्व में ष्ठस्नह्र घेराव का हुआ था—शोर-शराबे और प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित। सोशल मीडिया के दौर में ऐसे आंदोलनों का एक नया पहलू भी सामने आता है। विरोध के दौरान नारेबाजी से ज्यादा ध्यान रील और वीडियो बनाने पर रहता है, जिनमें पृष्ठभूमि में लोकप्रिय गानों के बोल— ‘जेक्या बाघ द करेजा देके ऊपर वाला भेज्या’ या ‘आरंभ है प्रचंड… ‘—सुनाई देते हैं। कुल मिलाकर जिले का अनुभव यह बताता है कि प्रशासनिक स्थिरता विकास की बुनियाद होती है, जबकि अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप व्यवस्था को कमजोर करता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि जिले में संतुलन कैसे बनता है—जहां प्रशासन ईमानदारी और निरंतरता के साथ काम करे और राजनीति जनहित तक सीमित रहे।


















