साल भर से सैलरी नहीं, मोरगा समिति के स्टाफ के सामने परेशानी

पिछले प्रबंधक के घपले का दुष्परिणाम
कोरबा। जिले में पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड अंतर्गत मोरगा की आदिवासी सेवा सहकारी समिति मर्यादित के स्टाफ को एक तरह से मजबूरी के चक्कर में उधारी अथवा बिना सैलरी के काम करना पड़ रहा है, वह भी पूरे एक साल से। स्थानीय होने के कारण ये लोग काम कर पा रहे हैं लेकिन उन्हें चिंता इसी बात की है कि लंबित राशि का भुगतान एक साथ कैसे हो सकेगा। यहां-वहां अपनी समस्या बताने पर भी इसका कोई हल न निकलने से ये कर्मी परेशान हैं।
मोरगा सहकारी समिति में सात कर्मचारी नियोजित हैं, जो एक साल से उधारी पर काम कर रहे हैं। कमीशन की राशि से इनके खर्चे निकलते हैं। इनमें वेतन से लेकर दूसरी जरूरतों का समायोजन होता है। इसके लिए उन्हें धान खरीदी सीजन की प्रतीक्षा होती है। वर्ष 2026 में अगर यहां हजारों क्विंटल धान की बिक्री हो जाए तो भी बड़ी बात है। वजह बताई गई कि एक तो इसमें समाहित गांव कम है और किसानों की संख्या सीमित। उपर से सरकार की नई नीति के कारण रकबा कटौती हो गई है। कई तरह के पेंच फंसने से भी समस्याएं हैं। इन सबके बीच हमें काम करना पड़ रहा है। मोरगा समिति के कर्मचारियों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि लगभग एक साल से उन्हें सैलरी नहीं मिली है। इसमें प्रबंधक से लेकर कैशियर और दूसरे काम करने वाले कर्मचारी शामिल हैं। सामान्य तौर पर सेवा सहकारी समितियों के लिए जो सेटअप बनाया गया है उसमें खर्चों का इंतजाम कमीशन की राशि से ही होता है। खबर के अनुसार यहां के पिछले प्रबंधक के द्वारा कामकाज के दौरान की गई गंभीर गड़बड़ी में लाखों का झोल सामने आया। इसका सच उजागर होने पर प्रशासन ने कार्रवाई की और उसे पिछले वर्ष हटा दिया गया। लेकिन असली मसला घपले की राशि की वसूली का है। कहा जा रहा है कि जहां कहीं भी इस प्रकार के मामले होते हैं उसकी रिकव्हरी वही समिति करती है और इसकी कीमत कर्मचारियों को चुकानी पड़ती है। मोरगा समिति का स्टाफ पिछले प्रबंधक की मनमानी या स्वेच्छाचारिता की सजा भुगतने को मजबूर हैं और लंबे समय से उन्हें बिना वेतन के काम करना पड़ रहा है।
बीते वर्ष जांच पड़ताल के बाद हुई कार्यवाही के साथ इस समिति के प्रबंधक का प्रभार हरिनंदन सिंह को सौंपा गया। वे अब यहां की व्यवस्थाओं को देख रहे हैं। धान खरीदी का काम उनके जिम्मे है। उन्होंने बताया कि कामकाज सामान्य तौर पर चल रहा है। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती कर्मियों को पिछला बकाया भुगतान करने की है, जो पैरामीटर्स बने हैं उसके हिसाब से ही काम होना है। बताया गया कि धान खरीदी सत्र 2025-26 का कामकाज अंतिम रूप से मिलान के बाद पूरा होगा। समय पर प्रोत्साहन राशि प्राप्त होती है और अधिकारी इस दिशा में संवेदनशीलता दिखाते हैं तो हमारे स्टाफ पर कृपा होगी।

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