
कोरबा,। अधिवक्ता धनेश सिंह ने कहा है कि भारतीय संविधान, नागरिक स्वतंत्रताओं और मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया ताज़ा निर्णय न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि पुलिसिया मनमानी और ट्रायल बाय मीडिया जैसी प्रवृत्तियों पर करारा प्रहार भी है। म न्यायमूर्ति फरजंद अली ने अपने साहसिक, दूरदर्शी और स्पष्ट निर्णय में दो टूक कहा है कि गिरफ्तार व्यक्तियों की तस्वीरों को सार्वजनिक करना संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है और इसे किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि अनुच्छेद 21 केवल जीवन रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक को सम्मान, प्रतिष्ठा और गरिमापूर्ण जीवन जीने का मूल अधिकार प्रदान करता है। किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के साथ उसकी मानवीय गरिमा, निजता और सामाजिक सम्मान समाप्त नहीं हो जाते। कानून के शिकंजे में होने के बावजूद भी व्यक्ति का अपमान करना या उसे सार्वजनिक रूप से कलंकित करना संविधान की आत्मा के खिलाफ है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि दोष सिद्ध होने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। ऐसे में पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्तियों की तस्वीरें मीडिया या सोशल मीडिया में जारी करना न केवल पूर्वाग्रहपूर्ण मानसिकता को जन्म देता है, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक छवि को अपूरणीय क्षति भी पहुंचाता है। यह प्रक्रिया न्याय के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल है।राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक की गई तस्वीरों को हटाने के निर्देश दिए हैं और साथ ही राज्य सरकार से जवाब तलब कर भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस नीति बनाने को कहा है। यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य डर पैदा करना या अपमानित करना नहीं, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है।ट्रायल बाय मीडिया और पुलिसिया प्रचार पर न्यायिक लगाम
यह निर्णय उन प्रवृत्तियों पर भी सख्त चोट है, जहां गिरफ्तारी को ही अपराध सिद्धि मानकर मीडिया ट्रायल और पुलिसिया प्रचार किया जाता है। हाईकोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि कानून के नाम पर किसी भी नागरिक की गरिमा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।यह फैसला न केवल पुलिस प्रशासन के लिए कड़ा मार्गदर्शक सिद्ध होगा, बल्कि आम नागरिकों के मन में यह भरोसा भी मजबूत करेगा कि न्यायपालिका आज भी संविधान की प्रहरी है।
यह निर्णय लोकतांत्रिक व्यवस्था, मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को सशक्त करने वाला एक मील का पत्थर है।राजस्थान उच्च न्यायालय का यह साहसिक और संवेदनशील निर्णय नि:संदेह संवैधानिक मूल्यों की विजय और मनमानी के विरुद्ध कानून के शासन की स्पष्ट घोषणा है।



















