
कोरबा | देश की महारत्न कंपनी एनटीपीसी (NTPC) जहाँ एक ओर बिजली उत्पादन में नए कीर्तिमान रच रही है, जानकारी के अनुसार वहीं दूसरी ओर कोरबा परियोजना का जनसंपर्क (PR) और सीएसआर (CSR) विभाग अपनी कार्यशैली से संस्थान की छवि को धूमिल करने में जुटा है। करोड़ों के बजट और कागजी दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि आसपास के ग्रामीण और जनमानस आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। प्रबंधन की इस ‘बेलगाम’ कार्यप्रणाली ने जनता के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है।
कागजों पर ‘सशक्तिकरण’, हकीकत में ‘तिरस्कार’
एनटीपीसी की स्थापना के समय समावेशी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल प्रशिक्षण का जो संकल्प लिया गया था, वह कोरबा परियोजना में केवल फाइलों तक सीमित नजर आ रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार तीन स्तरीय सीएसआर संरचना का दावा करने वाला प्रबंधन जमीनी स्तर पर ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। सीएसआर की गतिविधियों ने आसपास की आबादी को राहत देने के बजाय उन्हें सदैव उपेक्षित और असंतुष्ट ही महसूस कराया है।
जनसंपर्क नहीं, यह ‘असंवेदनशीलता’ की पराकाष्ठा है
संस्थान के भीतर सबसे अधिक सड़ांध परियोजना की जनसंपर्क शाखा में देखने को मिल रही है। यहाँ पदस्थ अधिकारी और कर्मचारी न केवल गैर-जिम्मेदार हैं, बल्कि उनकी कार्यशैली अत्यंत ही बेपरवाह और असंवेदनशील हो चुकी है। जनसामान्य की समस्याओं पर संवाद करना तो दूर, ये जिम्मेदार अधिकारी पत्रकारों तक फोन उठाना तक मुनासिब नहीं समझते। उत्कृष्ट तकनीक के साथ जिस सौम्य और संयमित संवाद शैली की उम्मीद एक सार्वजनिक उपक्रम से की जाती है, उसका यहाँ पूरी तरह अभाव है।
‘अहंकार’ में डूबा प्रबंधन, साख बचाने की चुनौती
भोंडे ढंग से किए जा रहे संवाद और बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुके इन विभागों के कारण एनटीपीसी-कोरबा के खाते में उपलब्धियों के बजाय ‘अपयश’ की गाथा लंबी होती जा रही है। यदि समय रहते इन गैर-जिम्मेदार अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी गई और संवाद के रास्ते नहीं खोले गए, तो आने वाले समय में जन-आक्रोश प्रबंधन के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।



















