झारखंड के जंगलों को आग से बचाने की पूरी तैयारी, 150 साल पुरानी फायर लाइनें होंगी सक्रिय

रांची, ३० जनवरी ।
राज्य के जंगलों में लगने वाली आग को रोकने के लिए सबसे सुरक्षित सिस्टम फायर लाइन को फिर से सक्रिय किया जाएगा। जंगलों में 10 से 20 मीटर चौड़ी पट्टी के तौर पर फायर लाइन बनाई जाती है। इससे आग फैलने से रूकती है और बुझाने में भी आसानी होती है। झारखंड के नेतरहाट फारेस्ट रेंज समेत कई जंगलों में 1865 से फायर लाइन बनी हुई है। ब्रिटिश वन अधिकारियों ने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के साथ यहां के जंगलों में भी फायर लाइन बनवाए थे। अब वन एवं पर्यावरण विभाग इस महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच को फिर से पुनर्जीवित करने जा रहा है।इसके साथ ही जंगलों में कच्ची सडक़ और चौड़ी पगडंडी को भी फायर लाइन के तौर पर विकसित किया जाएगा। इनपर हुए अतिक्रमण को हटाकर इन्हें आग से बचाव वाली पट्टी के तौर पर तैयार किया जाएगा। इनपर उग आई झाडिय़ों को हटाकर वहां से सूखी पत्तियों को भी दूर करेंगे। पूर्व वन अधिकारी राकेश रमण ने बताया कि फायर लाइन से आग रोकने की तकनीक पूरी तरह स्वदेशी है और यह 150 सालों से अधिक समय से झारखंड के जंगलों में भी प्रयोग में लाई जा रही है।पिछले कुछ सालों से इस महत्वपूर्ण पारंपरिक आगरोधी तरीके को कम महत्व दिया जा रहा था। लेकिन इसकी उपयोगिता और आग बुझाने में कारगर होने की वजह से विभाग फिर से इसे तैयार कर रहा है।जंगलों में बसे गावों के लोग आने जाने के लिए जिस पट्टी के उपयोग करते हैं उसे फायर लाइन बनाने की योजना है। भारत सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में सलाहकार अमितेश आनंद इन फायर लाइन की पहचान में ग्रामीणों की मदद को महत्वपूर्ण मानते हैं। उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में उनकी टीम ने ग्रामीणों के साथ मिलकर करीब 100 किलोमीटर की पट्टी तलाशी है जिससे आग लगने की घटना में 40 प्रतिशत की कमी आई है। अब इसी प्रयोग को झारखंड के जंगलों में दोहराने की तैयारी है जिससे अप्रैल से जुलाई तक जंगलों में लगने वाली आग पर काबू हो सके।
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