अडानी पावर के प्रभावितों ने जताया पूर्व मंत्री जयसिंह पर भरोसा

कोरबा । 800 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता वाले अदानी पावर के कोरबा पावर प्लांट के विस्तार से ठीक पहले परियोजना के प्रभावितों दे रोजगार और पुनर्वास से संबंधित वादों की पूर्ति के लिए दबाव बनाया है। उन्होंने प्रदेश सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री जयसिंह अग्रवाल से इस बारे में हस्तक्षेप करने की मांग की।
हजारों करोड़ के निवेश के साथ पिछले वर्षों में लैंको अमरकंटक पावर प्रोजेक्ट ने काम किया। वर्ष 2012-13 में तीसरी और चौथी इकाई के विस्तार के समय आश्वासन दिया गया कि प्रभावितों को रोजगार और चिकित्सा शिक्षा जैसी सुविधा दी जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुछ समय के बाद या प्लांट बंद हो गया और अब इसे अदानी पावर ने अपने स्वामित्व में लिया है। प्रभावितों की चिंता इस बात को लेकर है कि पुराने वायदा का क्या होगा। उन्होंने पूर्व मंत्री अग्रवाल को पत्र
लिखकर कहा है कि पिछले वादों के पूरा न होने से लोग चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि मौजूदा कंपनी प्रबंधन और जिला प्रशासन से इस बारे में चर्चा कर स्थिति स्पष्ट कराई जाए। परियोजना के अंतर्गत आने वाले सरगबुदिया अमलीभाटा, सन्देल, खोड्डुल, पहंदा और बरीडीह के प्रत्येक प्रभावित परिवार को रोजगार सुनिश्चित करने के लिए ठोस और लिखित कार्य योजना तैयार की जाए। पुनर्वास और पुनर्स्थापना नीति को पारदर्शी तरीके से लागू करने के साथ उसे समय तक विस्तार प्रोसीडिंग्स पर रोक लगाई जाए, जब तक कि पिछले दायित्व का पालन नहीं होता।
पिछली सरकार में सुलझाया अनेक मामलों को
कांग्रेस सरकार के दौरान राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री रहते हुए जय सिंह अग्रवाल ने केवल अपने विभाग बल्कि अनेक संबंधित विभागों से संबंधित समस्याओं को निराकृत कराया और लोगों को राहत दी। उन्होंने अपने कार्यों से लोगों के पीछे खास जगह बनाई और यही एक कारण है कि अभी भी जय सिंह अग्रवाल के नाम से लोगों के काम बड़ी आसानी से हो जाते हैं। पिछले दिनों कोरबा वेस्ट बिजली परियोजना प्रबंधन के द्वारा रामनगर स्याहीमुड़ी का रास्ता बंद करने को लेकर लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई। बाद में जय सिंह अग्रवाल ने प्रबंधन पर दबाव बनाया और बीच का रास्ता निकाला। लोगों का कहना है कि जन प्रतिनिधियों की इच्छा शक्ति और साहस के कारण बड़ी-बड़ी समस्याएं बहुत आसानी से निपट जाती हैं। जबकि कुछ मामलों में बहुत सारे नेताओं के पत्र सरकारी दफ्तरों के साथ-साथ कॉरपोरेट कंपनियों में धरे के धरे रह जाते हैं और होता कुछ नहीं।

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