
नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने कहा कि एसआइआर केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन और संघीय ढांचे के मूल से जुड़ा मुद्दा है। यह लोकतंत्र, संघवाद और जनता की सरकार की अवधारणा की जड़ से जुड़ा है। यदि बड़ी संख्या में लोगों को मताधिकार से वंचित किया जाता है तो उस चुनाव को जनता की सरकार चुनने वाला चुनाव कैसे कहा जा सकता है? निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता लोकतंत्र के हित में काम करनी चाहिए। एक साक्षात्कार में उन्होंने विभिन्न राज्यों में एसआइआर की प्रक्रिया पर कहा कि विवाद से बचने के लिए व्यापक परामर्श से तैयार स्पष्ट प्रारूप आवश्यक है। हितधारकों, खासकर राजनीतिक दलों से व्यापक परामर्श के बाद एक मानक प्रारूप तय होना चाहिए। प्रश्नावली, कार्यप्रणाली और गणनाकर्मियों के प्रशिक्षण की मदद से होने वाली जनगणना एक अच्छा उदाहरण है।
एसआइआर के लिए सहमति से बना कोई प्रारूप नहीं है, प्रक्रिया जल्दबाजी में की गई। आयोग ने मनमाने बदलाव किए। यह पारदर्शी प्रक्रिया नहीं थी, जो लोगों का विश्वास जीत सके। इससे लोकतांत्रिक भागीदारी कमजोर हुई। इस प्रक्रिया के परिणामों की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को लेनी चाहिए।
सरकार की शिकायतों की अनदेखी
एसआइआर को लेकर हाल में आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बंगाल सरकार की शिकायतों का समाधान नहीं हुआ है। इन मुद्दों के निपटारे के लिए शीर्ष अदालत को निर्वाचन आयोग को विशिष्ट निर्देश देने की आवश्यकता है। बंगाल में हुए एसआइआर की आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक भागीदारी को कमजोर करने और राज्य के चुनावी संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास बताया।































