
नई दिल्ली। न्याय को सुलभ, व्यावहारिक और मानवीय बनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए चीफ जस्टिस (सीजेआइ) सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय प्रणाली को केवल कानूनी रूप से सक्षम या शक्तिशाली लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह हाशिए पर पड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
न्याय प्रणाली में तकनीकी व मानवीय संवेदना का संगम नई दिल्ली में कॉमनवेल्थ ज्यूडिशियल एजुकेटर्स (सीजेई) की 11वीं द्विवार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायिक नेतृत्व को केवल प्रशासनिक अधिकार या संस्थागत पदानुक्रम तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे एक बौद्धिक और नैतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ”’प्रक्रियात्मक जटिलता उन लोगों के लिए बाधा नहीं बननी चाहिए जिन्हें सुरक्षा की आवश्यकता है। अदालतों को यह सुनिश्चित करने के लिए सतर्क रहना चाहिए कि न्याय प्रणाली मानवीय और सुलभ हो।”’ तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा करते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का एकीकरण आवश्यक है, लेकिन एआइ को न्यायिक तर्क की सहायता करनी चाहिए, उसका स्थान नहीं लेना चाहिए। मुकदमेबाजी से न्याय-केंद्रित तंत्र की ओर बदलाव सीजेआइ ने इस बात पर जोर दिया कि मध्यस्थता, सुलह और विशेष अदालतों का बढ़ता चलन एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब हम ‘मुकदमेबाजी-केंद्रित मॉडल’ से ‘न्याय-केंद्रित इकोसिस्टम’ की ओर बढ़ रहे हैं।
उनके अनुसार, न्याय केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक होना चाहिए जो समयबद्ध, कुशल और वादियों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो। उन्होंने कहा, ”’न्यायाधीशों को न केवल संवैधानिक कानून के सिद्धांतों को समझना चाहिए, बल्कि उन दार्शनिक आधारों को भी समझना चाहिए जो उन सिद्धांतों को अर्थ देते हैं।”’
































