आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम: मां महामाया मंदिर परिसर में बिना पेड़ काटे बना शेड

रामानुजगंज। जहां एक ओर क्षेत्र में विकास के नाम पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं, वहीं रामानुजगंज से एक सकारात्मक और प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। जिले के प्रमुख आस्था केंद्रों में से एक मां महामाया मंदिर परिसर में वर्षों से लंबित शेड निर्माण की मांग को इस प्रकार पूरा किया गया कि न केवल श्रद्धालुओं को सुविधा मिली, बल्कि एक विशाल और वर्षों पुराना नीम का पेड़ भी सुरक्षित रहा।मां महामाया मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। गर्मी, वर्षा और धूप से बचाव के लिए मंदिर परिसर में शेड निर्माण की मांग लंबे समय से की जा रही थी। स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों एवं श्रद्धालुओं द्वारा कई बार इस विषय को नगर पंचायत के समक्ष उठाया गया था।शेड निर्माण में सबसे बड़ी चुनौती: विशाल नीम का पेड़मंदिर परिसर में जिस स्थान पर शेड प्रस्तावित था, वहीं एक विशाल एवं घना नीम का पेड़ वर्षों से खड़ा था। यह पेड़ न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्राकृतिक छाया का भी प्रमुख स्रोत था। शेड निर्माण के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि निर्माण कार्य कैसे किया जाए ताकि पेड़ को कोई नुकसान न पहुंचे।अक्सर ऐसे मामलों में निर्माण कार्य को प्राथमिकता देते हुए पेड़ों की कटाई कर दी जाती है, परंतु यहां अलग सोच के साथ निर्णय लिया गया।तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष की पहलतत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष के कार्यकाल में इस मांग पर गंभीरता से विचार किया गया। निर्माण एजेंसी और ंजीनियरों को स्पष्ट निर्देश दिए गए कि शेड का डिजाइन इस प्रकार तैयार किया जाए जिससे नीम का पेड़ पूरी तरह सुरक्षित रहे। परिणामस्वरूप शेड की संरचना को पेड़ के चारों ओर समायोजित करते हुए विशेष डिजाइन तैयार किया गया।शेड का निर्माण इस तरह किया गया कि पेड़ को काटने या उसकी शाखाओं को नुकसान पहुंचाने की ावश्यकता नहीं पड़ी। पेड़ को संरचना के बीच सुरक्षित स्थान देते हुए शेड को आकार दिया गया, जिससे प्राकृतिक छाया और कृत्रिम संरचना का सुंदर समन्वय स्थापित हुआ।आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेशस्थानीय नागरिकों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन का उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो विकास कार्यों को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर भी किया जा सकता है।जहां एक ओर कई स्थानों पर बिना आवश्यकता भी पेड़ों की कटाई कर दी जाती है, वहीं मां महामाया मंदिर परिसर का यह मॉडल यह दर्शाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि संवेदनशील निर्णयों से संभव है।श्रद्धालुओं को मिली बड़ी राहतशेड निर्माण के बाद अब श्रद्धालुओं को धूप और बारिश से राहत मिल रही है। विशेष रूप से त्यौहारों और नवरात्रि जैसे अवसरों पर जब बड़ी संख्या में भक्त मंदिर पहुंचते हैं, तब यह शेड अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। साथ ही, परिसर की सुंदरता भी बनी हुई है और नीम का पेड़ आज भी श्रद्धालुओं को शीतल छाया प्रदान कर रहा है।अनुकरणीय पहलपर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इस प्रकार की पहल अन्य शासकीय और अद्र्धशासकीय संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकती है। विकास कार्यों के दौरान पेड़ों को संरक्षित रखने के लिए डिजाइन आधारित समाधान अपनाए जा सकते हैं।रामानुजगंज की यह पहल न केवल स्थानीय स्तर पर सराही जा रही है, बल्कि यह संदेश भी दे रही है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित सोच के साथ दोनों का संरक्षण संभव है।

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