
कई साल से अधूरा पड़ा पीएम आवास, कागजों में हुआ पूर्ण:जिम्मेदारों पर उठे सवाल
कोरिया/बैकुंठपुर। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण (PMAY-G) भारत सरकार द्वारा 1 अप्रैल 2016 को लागू की गई थी। इससे पहले यह योजना इंदिरा आवास योजना (IAY) के नाम से संचालित होती थी। योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेघर एवं कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है। वर्ष 2024 तक ‘सभी के लिए आवास’ का लक्ष्य रखा गया था, जिसे अब बढ़ाकर 2028-29 तक कर दिया गया है। यह योजना ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन संचालित होती है।
लेकिन कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड में इस महत्वाकांक्षी योजना की जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। सोनहत जनपद क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में ऐसे अनेक हितग्राही हैं, जिनके आवास पिछले कई वर्षों से अधूरे पड़े हुए हैं, जबकि सरकारी रिकॉर्ड और पोर्टल में उन्हें पूर्ण दर्शाया जा चुका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2016-17 में बड़ी संख्या में हितग्राहियों के नाम स्वीकृत किए गए थे। शासन द्वारा चरणबद्ध तरीके से किस्तों के माध्यम से राशि जारी की गई, ताकि निर्धारित समय सीमा में निर्माण कार्य पूर्ण हो सके। लेकिन कई स्थानों पर पहली या दूसरी किस्त मिलने के बाद भी मकान निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया। कहीं केवल नींव तैयार की गई है, तो कहीं दीवारें खड़ी कर छत डालना बाकी है। इसके बावजूद संबंधित पोर्टल पर आवास पूर्ण दिखा दिया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर निर्माण कार्य की समुचित मॉनिटरिंग नहीं की गई। कुछ मामलों में बिना स्थल निरीक्षण के ही पूर्णता प्रमाणित कर रिपोर्ट भेज दी गई। परिणामस्वरूप वास्तविक हितग्राही आज भी कच्चे या जर्जर मकानों में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। बताया जा रहा है कि कई हितग्राहियों को अंतिम किस्त का इंतजार है, लेकिन रिकॉर्ड में मकान पूर्ण दर्ज होने के कारण आगे की राशि स्वीकृत नहीं हो पा रही है। इससे न केवल योजना का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि गरीब परिवारों को भारी आर्थिक एवं मानसिक परेशानी झेलनी पड़ रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही, अनियमितता या मिलीभगत सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेता है और वर्षों से अधूरे पड़े आवासों को धरातल पर पूर्ण कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।























