
दंतेवाड़ा। भोर का धुंधलका और बस्तर के ऊंचे साल वृक्षों की ओट.. इसी के बीच बिना आहट किए सुरक्षा बलों का एक दस्ता आगे बढ़ता है। हाथों में हथियार, पीठ पर किट, सतर्क निगाहें और अडिग संकल्प लिए। इस सैन्य अभियान का सबसे गौरवशाली हिस्सा हैं- इसमें शामिल महिला कमांडो। घर-आंगन की चौखट लांघकर ये महिलाएं आज माओवादी हिंसा के बीच सुरक्षाबलों की सबसे मजबूत ढाल बनकर सामने खड़ी हैं। दंतेवाड़ा में पदस्थ रहे पूर्व डीआइजी कमलोचन कश्यप कहते हैं कि माओवादियों के खिलाफ संघर्ष के शुरुआती वर्षों में सुरक्षाबलों के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां थीं। सर्च आपरेशन के दौरान संदिग्ध महिलाओं की तलाशी लेना, ग्रामीण महिलाओं से संवाद करना और गांवों के सामाजिक माहौल को समझने में अक्सर मुश्किल होती थी। माओवादी इस स्थिति का फायदा उठाकर महिला कैडरों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते थे। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए सुरक्षाबलों ने महिला कमांडो की भर्ती की रणनीति बनाई। वर्ष 2006 में सीमित भूमिका के साथ पहली बार डीआरजी में महिला जवानों की भर्ती शुरू हुई। वर्ष 2016 के बाद विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें सक्रिय अभियानों में उतारा गया और 2018 के बाद उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई।
दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी फाइटर्स, सुकमा में दुर्गा फाइटर्स और सीआरपीएफ की बस्तर फाइटर्स महिला कमांडों की विशेष इकाई है। बस्तर संभाग में 2,000 से अधिक महिला जवान विभिन्न सुरक्षाबलों में तैनात हैं। इनमें करीब 120 ऐसी महिलाएं भी हैं, जो कभी माओवादी संगठनों से जुड़ी थीं। आंकड़े बताते हैं पराक्रम की कहानी सुरक्षाबलों के अनुसार, पिछले सात-आठ वर्षों में महिला कमांडो 200 से अधिक मुठभेड़ों में शामिल रही हैं। इस दौरान 150 से अधिक माओवादियों को ढेर करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।इस बदलती कहानी की एक मिसाल सुंदरी इस्काम हैं। कभी माओवादियों के लिए बंदूक उठाने वाली सुंदरी आज दंतेश्वरी फाइटर्स की महिला कमांडो हैं। वह कहती हैं कि उनकी जिम्मेदारी सिर्फ माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि हम गांवों में लोगों की मदद भी करते हैं। जंगल के भीतर बसे गांवों में जब कोई बीमार होता है, तो दवा पहुंचाना, महिलाओं से बात करना और उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी देना भी हमारा काम है।
कमांडो सुमित्रा ठाकुर बताती हैं कि बस्तर के जंगलों में ड्यूटी आसान नहीं है। दिन-रात के लंबे आपरेशन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और हर पल खतरे की आशंका, लेकिन इसके बावजूद महिला जवान पीछे नहीं हटतीं।
























