
नईदिल्ली 11 मार्च ।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत में पहली बार पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दी है। यह फैसला पिछले 13 साल कोमा में रह रहे एक शख्स के लिए आया है। 32 साल के हरीश राणा की जिंदगी सिर्फ मशीनों और ट्यूबों के सहारे चल रही थी, लेकिन अब कोर्ट ने उनके पिता की गुहार पर जीवन-रक्षक इलाज (लाइफ सपोर्ट सिस्टम) हटाने की इजाजत दे दी। यह फैसला 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट पर आधारित है, जिसमें गरिमा के साथ मरने का मौलिक अधिकार को मान्यता दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह पहला मौका है जब इन दिशानिर्देशों को असल में लागू किया गया है। हरीश राणा कभी एक तेज-तर्रार, पढ़ाई-लिखाई में अच्छा युवक था। 2013 में चंडीगढ़ में अपनी पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। गंभीर ब्रेन इंजरी के कारण वह परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में चला गया। उसकी बॉडी 100 फीसदी क्वाड्रिप्लेजिक हो गई। पिछले 13 सालों में उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। वह बिस्तर पर पड़ा रहा, ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब से सांस लेता रहा और पेट में लगे पीईजी ट्यूब से क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन के जरिए पोषण मिलता रहा। मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं कि उसके शरीर पर बड़े-बड़े बेड सोर्स हो गए थे। डॉक्टरों ने साफ कहा कि रिकवरी की कोई उम्मीद नहीं बची है। हरीश के पिता ने सालों से अपने बेटे की हालत देखी और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 2024 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। फिर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लिया। कोर्ट ने प्राइमरी और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड बनवाए, जिसमें ्रढ्ढढ्ढरूस् के एक्सपर्ट्स शामिल थे। दोनों बोर्डों ने एकमत से कहा कि हरीश की हालत अपरिवर्तनीय है। इलाज जारी रखना सिर्फ उसकी बायोलॉजिकल एक्जिस्टेंस को लंबा खींच रहा है, कोई फायदा नहीं दे रहा। माता-पिता और मेडिकल बोर्ड दोनों की राय थी कि ष्ट्रहृ जैसे इलाज को बंद करना ही उसके हित में है। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने रिपोर्ट पढक़र कहा कि यह दुखद रिपोर्ट है और लडक़े को ऐसे ही नहीं रखा जा सकता।



















