कोरबा। कैप्टिव पावर प्लांट इकाईयों का संचालन मूलत: कोयला पर टिका हुआ है। जरूरत यह है कि नीयत मांगों के अंतर्गत यहां कोयला दिया जाए। कोयला की उपलब्धता नहीं होने के चलते इकाईयों के लाभार्जन और स्थायित्व पर विपरित प्रभाव होगा। खास बात है कि पांच वर्ष में बिजली की लागत 100 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। कोयला की उपलब्धता नहीं होने से इकाईयां अपने बिजली संयंत्रों को लगभग 50 फीसदी क्षमता पर ही संचालित कर पा रही है।
छत्तीसगढ़ में विभिन्न प्रकार के खनिज काफी मात्रा में हैं। जिनके प्रसंस्करण के लिए अनेक उद्योग संचालित हैं। प्रदेश की वर्तमान बिजली उत्पादन क्षमता लगभग 24 हजार मेगावाट है। यह बिजली देश के अलग-अलग क्षेत्रों में वितरित की जाती है। इससे देश के उद्योगों के विकास के साथ ही कृषि क्षेत्र की उन्नति हो रही है। देश के कुल कोयला भंडार का 18 फीसदी हिस्सा यानि 56 बिलियन टन कोयला छत्तीसगढ़ में है। एसईसीएल का वार्षिक उत्पादन लक्ष्य 165 मिलियन टन है और देश का कुल कोयला उत्पादन का 25 फीसदी उत्पादन छत्तीसगढ़ से है। ऊर्जा उपलब्धता की दृष्टि से अग्रणी राज्य छत्तीसगढ़ में निवेशकों ने काफी निवेश किया है। वर्तमान में 200 उद्योग यहां कार्यशील हैं। इन उद्योगों में 4000 मेगावाट के केप्टिव पावर प्लांट स्थापित हैं। इनके सुचारू संचालन के लिए हर वर्ष 32 मिलियन टन कोयला आवश्यक है, जो एसईसीएल के उत्पादन का मात्र 19 प्रतिशत है। देश में विद्युत संयंत्रों के कोल स्टॉक में बढ़ोत्तरी होकर 131 मिट्रिक टन प्रति मेगावाट के स्तर पर पहुंच गई। छत्तीसगढ़ में विद्युत संयंत्रों का औसत कोल स्टॉक 48 मिट्रिक टन प्रति मेगावाट के स्तर पर है।
जानकारी है कि कोयला उपलब्धता का स्तर बेहतर न होने से संयंत्रों की क्षमता बाधित हो रही है। अपनी उत्पादक इकाईयों को संचालित करने के लिए उद्योग या तो बाहर से बिजली खरीद रहे हैं या फिर महंगी दर पर खुले बाजार से कोयला ले रहे हैं। हैरत है कि कुछ इकाईयों को दूसरे राज्यों से कोयला लेना पड़ रहा है अथवा आयात करना पड़ रहा है। यह तब हो रहा है जबकि एसईसीएल भरपूर मात्रा में कोयला उत्पादन कर रहा है। दिलचस्प पहलू है कि यह कोयला स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता के आधार पर न मिलकर दूसरे राज्यों के उद्योगों को दिया जा रहा है। अनुमानत: एसईसीएल अपने कुल उत्पादन का मात्र 15-20 प्रतिशत कोयला ही राज्य के उद्योगों को देता है। जबकि यहां के उद्योग सुचारू रूप से प्रचालित होने की स्थिति में आ जाएंगे। राज्य में मूल्य संवर्धित उत्पादन के निर्माण के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण होगा। राज्य में निवेश बढ़ेगा और अधिक से अधिक ऐसे उद्योग पनप सकेंगे जिनके लिए कच्चा माल राज्य के कुल प्राथमिक उद्योगों से प्राप्त होगा जो वर्तमान में बड़े पैमाने पर संचालित हैं। इससे राज्य को लगभग 200 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा और छत्तीसगढ़ के नागरिकों के लिए रोजगार के एक लाख अतिरिक्त अवसर पैदा होंगे।
इकाईयों और कामगारों पर असर
केप्टिव पावर प्लांट से संचालित हो रही इकाईयों में बड़ी संख्या में स्थानीय और देश के कोने-कोने से आए तकनीशियन सेवा दे रहे हैं। संख्या के दृष्टिकोण से देखा जाए तो लगभग 5 लाख तकनीशियन कामगार और उनके परिवार विभिन्न उद्योगों पर आश्रित हैं। यदि कोयला आपूर्ति के अभाव में सीपीपी की ऊर्जा पर आधारित इकाईयों का प्रचालन बंद होता है अथवा इनमें उत्पादन कम होता है तो इसका विपरित असर इन कारखानों में नियोजित लाखों कामगारों और उनके परिवारों पर पड़ेगा।
आखिर क्यों बाहर जा रहा छग का कोयला
सवाल उठाया जाना जरूरी है कि आखिर छत्तीसगढ़ का कोयला देश के दूसरे राज्यों में क्यों जा रहा है। आलम यह है कि यहां के बिजली घर कोयला की आपूर्ति में हो रही समस्या से परेशान हैं। नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि जहां जो संसाधन हैं, उनकी उपयोगिता वहां चलने वाले उद्योग में होना चाहिए। इस दृष्टि से कोयला और बिजली का पहला अधिकार छत्तीसगढ़ के लोगों का बनता है। राज्य की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद ही अगर कोयला और बिजली सरप्लस स्थिति में होती है तो इस शर्त पर ही उसकी उपलब्धता अन्य राज्यों को कराई जा सकती है। छत्तीसगढ़ के लोगों का सीधापन ही कहना होगा कि राज्य के संसाधनों के प्रथम प्रयोग को लेकर यहां के नागरिक आंदोलन की मानसिकता में नहीं हैं अन्यथा सीमावर्ती राज्यों पर दृष्टि दौड़ाई जाए तो वहां प्रदेश के संसाधनों को बाहर इतनी आसानी से नहीं जाने दिया जाता। रोजगार के विषय को देखा जाए तो प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है कि वह देश के किसी भी हिस्से में अपने कौशल से रोजगार प्राप्त कर सकता है। अगर राज्य में ही विभिन्न उद्योगों के जरिए कोयला, बिजली, पानी और दूसरे खनिज संसाधनों के दोहन की पर्याप्त संभावना मौजूद है तो निश्चित तौर पर सबसे पहला अधिकार राज्य के उद्योगों का होना चाहिए।