
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून का एक प्रविधान ”निर्भीक शासन” स्थापित करने की दिशा में विधायिका का प्रयास है। यह प्रावधान भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए पूर्व अनुमति को अनिवार्य करता है। इस तरह यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है और बेईमान अधिकारियों को दंडित करता है।
सरकार ने जस्टिस बीवी नागरत्ना और केवी विश्वनाथन की पीठ को बताया कि ”निर्भीक सुशासन” का सिद्धांत किसी भी संवैधानिक शासन का बहुत ही बुनियादी हिस्सा है। इसके बाद पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इसमें भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
60 प्रतिशत शिकायतों में जांच की मंजूरी दी गई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धारा 17ए विधायिका का एक और प्रयास है कि ईमानदार अधिकारियों को दंडित न किया जाए और बेईमान अधिकारी बच न सकें। पीठ ने 2018 में संशोधित धारा 17ए लागू होने के बाद से प्राप्त भ्रष्टाचार की शिकायतों की संख्या के बारे में पूछा। मेहता ने कहा कि वह सीबीआइ को प्राप्त शिकायतों के आंकड़े दे सकते हैं। 60 प्रतिशत शिकायतों में जांच की मंजूरी दी गई है। याचिकाकर्ता एनजीओ सेंटर फार पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा-उनका कहा है कि पिछले छह वर्षों में 2,395 शिकायतें प्रारंभिक जांच या जांच के लिए आईं। इनमें से 989 यानी लगभग 41 प्रतिशत मामलों को अस्वीकार कर दिया गया और 1,406 मामलों में जांच की मंजूरी दी गई।






























