प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद को जन-जन तक पहुंचाने में अरुण कुमार का सराहनीय योगदान

कोरिया बैकुंठपुर। कोरिया जिले की मिट्टी ने हमेशा समाज को ऐसे रत्न दिए हैं जिन्होंने अपने अथक प्रयासों और समर्पण से न केवल जिले का, बल्कि प्रदेश और देश का भी नाम रोशन किया है। इन्हीं में से एक नाम है अरुण कुमार शुक्ला का, जिन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा, योग और आयुर्वेदिक वनस्पतियों को घर-घर तक पहुँचाने का संकल्प लिया और उसे पूरी निष्ठा के साथ पूरा भी कर रहे हैं। छोटे से गाँव से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहचान बनाने वाले अरुण शुक्ला आज चिकित्सा और स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में एक मिसाल बन चुके हैं।अरुण कुमार शुक्ला का जन्म कोरिया जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ। बचपन से ही उनका रुझान प्रकृति, पेड़-पौधों और योगाभ्यास की ओर था। जहाँ अधिकतर युवा पारंपरिक शिक्षा पाकर नौकरी की ओर बढ़ते हैं, वहीं अरुण ने समाज की सेवा और आयुर्वेदिक चिकित्सा के प्रचार-प्रसार को अपना जीवन लक्ष्य बनाया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने इस दिशा में अध्ययन और अभ्यास किया तथा गाँव-गाँव जाकर लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा और योग के लाभ बताए। आज के आधुनिक समय में जहाँ लोग एलोपैथिक दवाइयों और त्वरित इलाज की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं, वहीं अरुण शुक्ला ने योग और आयुर्वेद को अपनाकर उसकी महत्ता को समझाया। उन्होंने योग रथ की शुरुआत की, जिसके माध्यम से वे सुदूर वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर लोगों को स्वास्थ्य जागरूकता प्रदान कर रहे हैं। यह रथ केवल प्रचार-प्रसार का साधन नहीं बल्कि ग्रामीणों के लिए चलित चिकित्सा केंद्र की तरह कार्य करता है। वनांचल क्षेत्र के लोग अक्सर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं। अस्पतालों की दूरी, चिकित्सकों की कमी और आधुनिक संसाधनों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण जनमानस छोटी-छोटी बीमारियों से भी जूझते रहते हैं। ऐसे में अरुण का यह प्रयास लोगों के लिए वरदान साबित हुआ। वे न केवल योग के माध्यम से स्वस्थ रहने की जानकारी देते हैं बल्कि जड़ी-बूटियों से बने सरल घरेलू उपचार भी बताते हैं, जिन्हें लोग आसानी से अपनाकर लाभान्वित हो सकते हैं। अरुण कुमार शुक्ला का मानना है कि प्रकृति ने हमें हर बीमारी का इलाज दिया है, बस जरूरत है उन परंपराओं और ज्ञान को पुन: अपनाने की। आज की पीढ़ी जहाँ रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों से परेशान है, वहीं आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा न केवल शरीर को रोगमुक्त करता है बल्कि मन और आत्मा को भी स्वस्थ रखता है। उन्होंने लोगों को गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी, आंवला, नीम, अदरक, हल्दी जैसी आयुर्वेदिक औषधियों के गुण बताए और यह समझाया कि कैसे इन साधारण सी लगने वाली वनस्पतियों से गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है। अरुण शुक्ला इस बात पर जोर देते हैं कि अगर लोग रोजमर्रा की जिंदगी में योग और आयुर्वेद को अपनाएँ तो अस्पतालों की कतारें काफी हद तक कम हो सकती हैं। अरुण कुमार शुक्ला का कार्य केवल कोरिया जिले तक सीमित नहीं है। उनके अथक प्रयासों ने उन्हें प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई है। कई राष्ट्रीय योग शिविरों और आयुर्वेद सम्मेलनों में उन्होंने भाग लेकर लोगों को प्रेरित किया। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए विचारों को सराहा गया और उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया।
राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह कोरिया जिले के लिए भी गौरव का विषय है। उनके कार्यों ने यह साबित किया है कि यदि संकल्प मजबूत हो और निष्ठा अडिग हो, तो एक साधारण इंसान भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। अरुण के प्रयासों का असर अब समाज में साफ दिखाई देने लगा है। गाँवों और कस्बों में लोग योगाभ्यास की ओर आकर्षित हो रहे हैं। महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग सभी सुबह-शाम योगाभ्यास कर रहे हैं। कई लोग जिन्होंने वर्षों तक दवाइयाँ खाईं, उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाकर स्वास्थ्य लाभ पाया है। विशेषकर महामारी के दौरान जब लोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय खोज रहे थे, उस समय अरुण शुक्ला ने आयुर्वेदिक काढ़ा, गिलोय और तुलसी जैसी जड़ी-बूटियों का महत्व बताकर लोगों को सुरक्षित रहने का सरल उपाय प्रदान किया। हालाँकि अरुण कुमार शुक्ला अपने स्तर पर निरंतर कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि यदि सरकार और समाज मिलकर इस दिशा में सहयोग करें तो परिणाम और भी व्यापक होंगे। प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों की स्थापना, योग शिविरों का आयोजन और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देकर न केवल स्वास्थ्य लाभ मिलेगा बल्कि रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे। आज के समय में जब लोग तनाव, प्रदूषण और अस्वस्थ जीवनशैली के कारण तरह-तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं, तब अरुण कुमार शुक्ला जैसे लोग समाज के लिए प्रेरणा हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि स्वास्थ्य का सच्चा मार्ग प्रकृति और योग में छिपा है। कोरिया जिले का यह सपूत अपनी मेहनत और समर्पण से न केवल लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर ले जा रहा है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है कि सच्ची सेवा वही है जो समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। उनका यह योगदान चिकित्सा जगत में अतुलनीय है और आने वाली पीढिय़ाँ उन्हें एक प्रेरणास्रोत के रूप में याद करेंगी। अखिल भारतीय प्राकृतिक शिक्षा परिषद राजघाट नई दिल्ली, अंतर्राष्ट्रीय नेचुरोपैथी चिकित्सा ऑर्गेनाइजेशन व आयुष मंत्रालय दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान से योग प्राकृतिक चिकित्सा एवं आयुर्वेदिक वनस्पतियों को घर-घर पहुंचने में इनका सराहनीय योगदान रहा है।

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