
Chhattisgarh Politics: छत्तीसगढ़ कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सड़कों पर आने लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के हालिया अंबिकापुर दौरे ने सरगुजा संभाग की राजनीति में हलचल मचा दी है। कहने को तो यह दौरा पारिवारिक और सामाजिक था, लेकिन टीएस सिंहदेव के ‘महल’ (गढ़) में जिस तरह से बघेल ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, उसने भविष्य के सियासी समीकरणों के बदलने के संकेत दे दिए हैं।
दानिश के घर ‘नाश्ता’ और कार्यकर्ताओं का ‘जोश’
अंबिकापुर में संगठन का कोई आधिकारिक कार्यक्रम नहीं होने के बावजूद, युवा कांग्रेस नेता दानिश रफीक के निवास पर नजारा कुछ और ही था। नाश्ते के बहाने जुटे सैकड़ों कार्यकर्ताओं और वाहनों के काफिले ने यह साबित कर दिया कि बघेल का जादू अब भी बरकरार है। जहाँ एक तरफ सिंहदेव समर्थक जिला अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक “बिना बुलावे न जाने” की बात कह रहे थे, वहीं दूसरी तरफ दानिश रफीक के घर कार्यकर्ताओं का तांता लगा रहा। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत खुद कार्यकर्ताओं को बघेल से मिलवाने में सेतु का काम करते दिखे।
शफी अहमद के घर दस्तक: कूटनीतिक चाल?
बघेल ने केवल अपने समर्थकों को ही नहीं साधा, बल्कि सिंहदेव गुट के बेहद करीबी माने जाने वाले शफी अहमद के घर पहुंचकर सबको चौंका दिया। हालांकि, इसे बेटी की शादी की पुरानी बधाई देने का निजी दौरा बताया गया, लेकिन राजनीति में ‘बिना मतलब’ के कोई मुलाकात नहीं होती। इसे सिंहदेव के खेमे में सेंधमारी की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।”
एकजुटता नहीं तो विपक्ष में रहने की ‘चेतावनी’
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का बयान कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि यदि गुटबाजी नहीं रुकी और कार्यकर्ता एकजुट नहीं हुए, तो भाजपा को हराना नामुमकिन होगा। उन्होंने इशारा किया कि अगर मनभेद खत्म नहीं हुए, तो चाहे बघेल हों या सिंहदेव, दोनों को विपक्ष में ही बैठना होगा।”
अंदर की बात
सियासी गलियारों में चर्चा है कि अंबिकापुर में बघेल की यह सक्रियता सीधे तौर पर संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने और सिंहदेव के वर्चस्व को चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा है। आने वाले दिनों में सरगुजा की गुटबाजी क्या मोड़ लेती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।




















