
मछुआरा संघ ने डुबान में नौका चलाकर जताया विरोध
कोरबा। बुका जलविहार में शनिवार को आदिवासी मछुआरा संघ (हसदेव जलाशय) कोरबा के बैनर तले सैकड़ों की संख्या में मछुआरे एकत्र हुए। पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक के बांगो बांध परियोजना से विस्थापित 52 गांवों के स्थानीय आदिवासी मछुआरों ने छत्तीसगढ़ सरकार की मत्स्य नीति 2022 के असंवैधानिक प्रावधानों का विरोध करते हुए हसदेव जलाशय की मत्स्य निविदा को तत्काल रद्द करने की मांग की।
छत्तीसगढ़ किसान सभा ने इस आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि बांगो डेम से प्रभावितों को ही मछली पालन का अधिकार मिलना चाहिए। किसान सभा के प्रदेश संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने कहा कि 1980 के दशक में बने बांगो बांध से 58 आदिवासी गांव डूब क्षेत्र में आए थे। विस्थापितों को तब आश्वासन दिया गया था कि वे जलाशय में मछली पालन कर जीवन-यापन कर सकेंगे, लेकिन बाद में बांध को निजी ठेकेदारों को सौंपने का निर्णय सरकार ने ले लिया। इससे स्थानीय मछुआरे अपने ही जल पर मजदूर बन गए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने मछुआरों की मांगें नहीं मानीं तो आंदोलन को सडक़ तक ले जाया जाएगा। आदिवासी मछुआरा संघ (हसदेव जलाशय) के फिरतू बिंझवार ने कहा कि 2003 और 2022 की मत्स्य नीति में बड़े जलाशयों को मत्स्य महासंघ के माध्यम से ठेके पर देने का प्रावधान जारी है। यह नीति आदिवासियों के अधिकारों का हनन करती है। संघ ने कहा कि यह व्यवस्था तीन दशक से चल रही है और अब इसका विरोध व्यापक रूप से किया जाएगा। ग्राम केंदई के रामबलि और धजाक के अथनस तिर्की ने बताया कि 2015 में दिया गया ठेका जून 2025 में समाप्त हुआ, लेकिन मत्स्य महासंघ ने अब पुन: 10 वर्षों की नई निविदा 8 अक्टूबर 2025 तक जारी कर दी है। इस बार भी बांध को निजी ठेकेदार को सौंपने की तैयारी है। मछुआरों ने ठेका प्रथा के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और रॉयल्टी आधारित मछली पालन की मांग दोहराई।




















