
नईदिल्ली 01 मार्च।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सशस्त्र बलों के जवानों की सेवानिवृत्ति आयु और सेवा शर्तों से जुड़े ब्रिटिश काल के पुराने नियमों से आगे बढऩे को कहा है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने तटरक्षक बलों के मानदंडों पर पुनर्विचार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने पर विचार करने को कहा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कहा गया था कि तटरक्षक बल में सभी रैंकों के लिए एक समान सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष होनी चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने अतिरिक्त सालिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा-सेवा शर्तों और सेवानिवृत्ति आयु से संबंधित इन नियमों की समीक्षा करने का यह सही समय है। सरकार ब्रिटिश काल में तैयार की गई सेवा शर्तों से बंधी नहीं रह सकती। आजकल कोई भी तटरक्षक बलों की भूमिका की कल्पना नहीं कर सकता। वर्तमान सेवानिवृत्ति आयु एक पुराने पैटर्न का अनुसरण करती प्रतीत होती है। पीठ केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो दिल्ली हाई कोर्ट के पिछले साल के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें कोस्ट गार्ड रूल्स, 1986 के नियम 20 को रद कर दिया गया था। इन नियमों के अनुसार, कमांडेंट और उससे नीचे के रैंक के अधिकारी 57 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते थे, जबकि कमांडेंट से ऊपर के अधिकारी 60 वर्ष की आयु पूरी करने पर रिटायर होते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतनी परिष्कृत और उच्च कौशल वाले बल में अनुभव का बहुत महत्व है। सरकार को सेवा शर्तों के संबंध में अत्यधिक स्थिर या रूढि़वादी रवैया नहीं अपनाना चाहिए। पीठ ने आदेश दिया-नोटिस जारी करें। अगले आदेश तक हाई कोर्ट के फैसले पर रोक रहेगी। दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल किया जा सकता है। हालांकि, हम केंद्र सरकार को निर्देश देते हैं कि वह तटरक्षक बल के जवानों की सेवा शर्तों पर पुनर्विचार के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करे।






















