
नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को स्वीकार करने के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी के WhatsApp चैट और काल रिकॉर्डिंग को पारिवारिक न्यायालय पुख्ता साक्ष्य के रूप में मान सकता है। यह भी कहा कि यदि निजता के नाम पर साक्ष्यों को रोका गया, तो पारिवारिक न्यायालय का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। रायपुर निवासी एक व्यक्ति ने पत्नी से विवाह विच्छेद के लिए पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दिया था। पति ने पत्नी की अन्य व्यक्तियों के साथ हुई WhatsApp चैट और काल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लेने के लिए आवेदन दिया था। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए आरोप लगाया कि पति ने उसका मोबाइल हैक कर अवैध रूप से ये साक्ष्य जुटाए हैं, जो उसकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है। परिवार न्यायालय ने पति की अर्जी को स्वीकार कर लिया, जिसे पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। पत्नी की याचिका को खारिज करते हुए जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकल पीठ ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय के पास विशेष अधिकार है कि वह मामले के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, भले ही वह सामान्यत: एविडेंस एक्ट के तहत स्वीकार्य न हो।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यदि साक्ष्य प्रासंगिक है, तो यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उसे किस प्रकार से प्राप्त किया गया है। अदालतों को दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाना होता है। पति को अपनी बात साबित करने के लिए प्रासंगिक साक्ष्य पेश करने का अवसर मिलना चाहिए। हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सार्वजनिक न्याय से जुड़ा है और यह निजता के व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर है। यदि निजता के नाम पर साक्ष्यों को रोका गया, तो पारिवारिक न्यायालय का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
अपनी गलती का लाभ उठाकर पति नहीं ले सकता तलाक
छत्तीसगढ़ में पारिवारिक न्यायालय बालोद जिले के एक वैवाहिक प्रकरण में निर्णय सुनाते हुए कहा कि कोई भी पक्षकार अपने दोषपूर्ण आचरण का लाभ उठाकर तलाक का हकदार नहीं हो सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक अलग रहना तलाक का स्वत: आधार नहीं बनता, जब तक वैधानिक क्रूरता सिद्ध न हो। इस मामले में पति ने तलाक की याचिका दायर की थी, यह कहते हुए कि उसकी पत्नी पिछले आठ वर्षों से उससे अलग रह रही है। पत्नी ने न्यायालय में बताया कि उसके अलग रहने का मुख्य कारण पति का एक महिला पुलिसकर्मी के साथ विवाहेतर संबंध है, जिससे उनकी 10 वर्षीय पुत्री भी है। इस स्थिति के कारण उसे गंभीर मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और वह अलग रहने को मजबूर हुई। न्यायालय ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए पति की याचिका को खारिज कर दिया।































