
कोरबा। जिले सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में सभी तरह के सरकारी निर्देशों और पर्यावरणीय नियमों को दरकिनार करते हुए खेतों में पराली जलाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। धान की फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों को नष्ट करने के लिए किसान खुलेआम आग लगा रहे हैं। जबकि शासन और प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर रोक लगाने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, इसके बावजूद कई क्षेत्रों में यह सिलसिला जारी है।
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है बल्कि जन स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से हवा में सूक्ष्म कण (पीएम 2.5 और पीएम 10) की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे सांस, आंख और त्वचा संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा खेतों में रहने वाले छोटे जीव-जंतु और मिट्टी की उर्वरता भी इससे प्रभावित होती है। सूत्रों के अनुसार कोरबा जिले के कई इलाकों से पराली जलाने के वीडियो भी सामने आए हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पराली जलाने की जानकारी होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभाग और स्थानीय प्रशासन द्वारा सख्त कार्रवाई नहीं की जा रही है।
यही वजह है कि किसानों में नियमों का डर कम होता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने के बजाय उसके वैकल्पिक उपयोग जैसे जैविक खाद निर्माण, पशु चारा, बायोएनर्जी उत्पादन या मशीनों के माध्यम से खेत में ही अवशेष मिलाने जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत है। साथ ही प्रशासन को भी जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना होगा।























