
भोपाल, २३ फरवरी ।
किसी बीमारी के उपचार में मरीज को दवा की कितनी खुराक देनी है, यह भारत में अभी अमेरिका और यूरोप के चिकित्सा मानकों के आधार पर तय होता है। लेकिन, जल्द ही यह मानक बदलने वाले हैं। भोपाल का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) अब भारतीयों की शारीरिक बनावट, खान-पान और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दवाओं के नए मानक तैयार करेगा। संस्थान का तकनीकी संसाधन केंद्र मुख्य रूप से बच्चों की खांसी, स्टेम सेल चिकित्सा, थायराइड (हाइपोथायरायडिज्म) और साइनसाइटिस यानी चार बीमारियों के उपचार के लिए राष्ट्रीय मानक विकसित करने की परियोजना पर काम कर रहा है। इसमें सटीक उपचार तो सुनिश्चित होगा ही, साइड इफेक्ट भी कम होगा। दरअसल, एम्स के विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता व जेनेटिक संरचना यूरोपीय-अमेरीकी देशों के लोगों से अलग होती है। इसमें भारतीय मरीजों को दी जाने वाली दवा कई बार जरूरत से अधिक मात्रा में हो जाती है।
इसके साइड इफेक्ट होते हैं। कई बार ऐसी महंगी दवाएं या टेस्ट लिखे जाते हैं, जिनकी भारतीय परिस्थितियों में जरूरत ही नहीं होती।एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक डा. माधवानन्द कर ने बताया कि साक्ष्य-आधारित चिकित्सा ही आधुनिक स्वास्थ्य सेवा का आधार है। हम भारतीयों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप राष्ट्रीय उपचार दिशा-निर्देश तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल इलाज की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि यह स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में भारतीयों का मेटाबालिज्म (पाचन व ऊर्जा प्रक्रिया) अलग होता है। अक्सर दवाओं के ओवरडोज से बच्चों को नुकसान होता है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा व बैतूल जिलों में कोल्ड्रिफ ब्रांड के कफ सीरप के सेवन से 25 बच्चों की मौत हो गई थी।
साइनसाइटिस जैसे रोगों में विदेशी प्रोटोकाल के तहत हैवी एंटीबायोटिक्स देने से भारतीयों मरीजों के पेट में मौजूद गुड बैक्टीरिया (जो पाचन में सहायक होते हैं) खत्म हो जाते हैं।(जैसा परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया)























