
गुना, २५ फरवरी ।
एक मां के लिए अपनी आंखों के सामने अपने इकलौते बेटे का शव देखना दुनिया का सबसे बड़ा दुख होता है। लेकिन गुना की अलका जैन के लिए यह दुख यहीं खत्म नहीं हुआ। जिस बेटे की मौत के सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थीं, उसी बेटे की हत्या के आरोप में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। अब जाकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने इस मामले में दखल देते हुए अलका जैन पर लगे सभी आरोपों को निरस्त कर दिया है और निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अलका जैन की शादी 1 जून 2006 में भोपाल में बैंक में पदस्थ अनुपम जैन से हुई थी। 1 फरवरी 2011 को उनके घर एक बेटे (अभ्युदय) का जन्म हुआ। पति के तबादले के कारण अलका अपने 15 वर्षीय बेटे के साथ गुना में रह रही थीं। 14 फरवरी 2025 की सुबह अलका ने अपने घर के बाथरूम में अपने इकलौते बेटे को फंदे से लटकता हुआ पाया। बदहवास माँ उसे लेकर तुरंत जिला अस्पताल दौड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट (15 फरवरी 2025) में मौत की वजह गला घोंटना बता दी गई। इसी आधार पर गुना पुलिस ने 22 फरवरी 2025 को अज्ञात के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 (हत्या) के तहत मामला दर्ज किया।
जांच में सीधे माँ (अलका) को ही आरोपी मानते हुए 8 मार्च 2025 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि, बाद में 16 जून 2025 को उच्च न्यायालय से उन्हें नियमित जमानत मिल गई थी। इस अन्याय के खिलाफ अलका के पति ने पुलिस मुख्यालय में शिकायत की। इसके बाद पुलिस अधीक्षक, गुना द्वारा एक विशेष जांच दल का गठन किया गया। जांच में यह बात सामने आई कि अभ्युदय अपनी पढ़ाई को लेकर अवसाद में था। उसके अंक लगातार गिर रहे थे; पांचवीं कक्षा में 89.5 प्रतिशत से गिरकर सातवीं में 64.7 प्रतिशत रह गए थे। विशेष जांच दल ने साफ़ कहा कि मां के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। पुलिस महानिरीक्षक, उप महानिरीक्षक और पुलिस अधीक्षक की मंज़ूरी के बाद अदालत में खात्मा रिपोर्ट पेश कर दी गई।कहानी में नया मोड़ तब आया जब गुना के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। 9 मई 2025 को बिना किसी ठोस सबूत के, महज़ कुछ शंकाओं (जैसे- माँ ही घर में थी, उसने ही फंदा काटा, आदि) के आधार पर मजिस्ट्रेट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 और 238 के तहत संज्ञान लेते हुए माँ पर मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया।
आखिरकार, यह मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। 9 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडक़े की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया:चिकित्सा विशेषज्ञों की 19 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट में साफ़ था कि आँखों में खून उतरना फांसी लगाने और गला घोंटने, दोनों ही स्थितियों में हो सकता है, जिसे निचली अदालत ने नजऱअंदाज़ कर दिया।मकान मालकिन (नेहा जैन) के बयान को भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अनदेखा किया, जिसमें उन्होंने साफ बताया था कि घटना के वक्त घबराहट में अलका ने चाबियों के गुच्छे से खुद चाबी ढूंढी थी।उच्च न्यायालय ने 9 मई 2025 के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करते हुए अलका जैन के खिलाफ चल रही पुलिस थाना कोतवाली गुना की सभी आपराधिक कार्रवाइयों (अपराध क्रमांक 115/2025) को हमेशा के लिए निरस्त कर दिया है। कानून की नजऱ में तो अलका अब आज़ाद हैं, लेकिन अपने इकलौते बेटे को खोने और समाज में कातिल कहलाने का जो दर्द उन्होंने झेला है, उसकी भरपाई शायद कोई अदालत नहीं कर सकती।




















