
नईदिल्ली, 0४ फरवरी ।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को वैवाहिक पोर्टल शादी डॉट काम के संस्थापक अनुपम मित्तल को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने धोखाधड़ी के मामले में मित्तल और दो अन्य आरोपितों को अगले दो सप्ताह तक गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है।यह मामला हैदराबाद की एक महिला की शिकायत से जुड़ा है। उसने आरोप लगाया था कि पोर्टल पर एक फर्जी प्रोफाइल के जरिये उससे 11 लाख रुपये की ठगी की गई। महिला का तर्क था कि यह प्लेटफार्म यूजर से जुड़े विवरणों को सत्यापित करने में विफल रहा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस पुराने आदेश को रद कर दिया, जिसमें मित्तल के खिलाफ कार्यवाही को खत्म करने से इन्कार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस हाईकोर्ट भेजते हुए कहा, चूंकि क्वैशिंग पेटिशन पर मेरिट के आधार पर निर्णय नहीं लिया गया था, इसलिए हम आक्षेपित आदेश को रद करते हैं और मामले को नए सिरे से विचार के लिए हाईकोर्ट में वापस भेजते हैं। इस बीच, याचिकाकर्ता अंतरिम राहत के लिए हाईकोर्ट में अपील करेंगे। आज से आठ सप्ताह की अवधि तक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। मित्तल की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आत्माराम नाडकर्णी ने दलील दी कि शादी डॉट काम केवल एक मैचमेकर की भूमिका निभाता है। उन्होंने कोर्ट में सवाल उठाया, मैं केवल मिलान की सुविधा प्रदान कर रहा हूं। हम जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं, लेकिन मुझे इस मामले में आरोपित क्यों बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के तथ्यों पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। अब तेलंगाना हाईकोर्ट को इस मामले पर फिर से विचार करना होगा। पिछले साल हाईकोर्ट ने मित्तल और अन्य आरोपितों – विग्नेश और सतीश – के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। 26 जून को सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगाते हुए तेलंगाना सरकार को नोटिस जारी किया था। समय पर न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उच्च न्यायालयों द्वारा महीनों तक फैसलों को सार्वजनिक किए बिना सुरक्षित रखे जाने की प्रथा एक चिह्नित बीमारी है। इसे पूरी तरह समाप्त करना अनिवार्य है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि झारखंड उच्च न्यायालय ने पिछले साल चार दिसंबर को एक याचिका खारिज करते हुए मौखिक रूप से फैसला सुनाया था और वह फैसला दो महीने बाद भी अपलोड नहीं किया गया है। पीठ ने कहा कि अगले सप्ताह के आखिर तक वकील को पूरा फैसला उपलब्ध कराया जाए। फैसले में देरी का जिक्र करते हुए वादी की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि यह स्थिति कानून की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने जैसी है।इस पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने जजों की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए कहा, “कुछ जज बेहद मेहनती होते हैं, कई मामलों की सुनवाई कर फैसले सुरक्षित रखते हैं, लेकिन फिर लंबे समय तक निर्णय नहीं देते। यह व्यक्तिगत आरोप नहीं है, बल्कि पूरी न्यायपालिका के सामने एक चुनौती है। यह बीमारी है और इसे फैलने नहीं दिया जा सकता। प्रधान न्यायाधीश ने यह भी चिंता जताई कि कई मामलों में बहस पूरी होने के बाद भी केस को बार-बार आगे के निर्देशों के लिए सूचीबद्ध किया जाता है, जिससे अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है। उन्होंने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 वर्षों के कार्यकाल में मैंने कभी भी ऐसा नहीं किया कि फैसला सुरक्षित रखा हो और तीन महीने के भीतर सुनाया न हो। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के आगामी सम्मेलन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएंगे।





















