
कोरबा। एसईसीएल कुसमुंडा खदान के लिए गेवरा बस्ती के अधिग्रहण की जारी प्रक्रिया मुआवजे की फाइल को एसईसीएल मुख्यालय से मंजूरी मिलने के बाद ही आगे बढ़ेगी।
वहीं बस्ती के विस्थापन पर प्रभावितों ने शहर के नजदीक बसाहट की मांग रखी है। दूसरे गांवों का विस्थापन कर पहले गेवरा बस्ती के प्रभावितों के लिए चिन्हित स्थान पर बसाने से खदान प्रभावितों ने बसाहट पर निर्णय लेने डीआरआरसी की मीटिंग की मांग की है। 2013 में गेवरा बस्ती का अधिग्रहण किया गया है। एसईसीएल कुसमुंडा परियोजना के लिए अधिग्रहित गेवरा बस्ती का ड्रोन सर्वे कराकर मुआवजे की फाइल कंपनी मुख्यालय को भेजी गई है। दो महीने बाद भी मंजूरी नहीं मिली है। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में लेटलतीफी से भू-विस्थापितों के रोजगार की आस अधूरी है।
एसईसीएल ने गेवरा बस्ती की 1243.557 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है। 2913 प्रभावितों को लगभग 299.29 करोड़ रुपए का मुआवजा बंटेगा। कंपनी मुख्यालय से मंजूरी न मिलने से विस्थापन व अन्य प्रक्रिया अटकी हुई है। इस बीच गेवरा बस्ती के खदान प्रभावितों ने एसईसीएल कुसमुंडा एरिया जीएम के नाम ज्ञापन दिया है। बताया गया है कि फरवरी 2015 में इंदिरा स्टेडियम में जनसुनवाई हुई थी। इसमें वैशाली नगर खम्हरिया के पास बसाहट देने गेवरा बस्ती के प्रभावितों को आश्वस्त किया गया था।
इस जगह पर खोडरी को और गेवरा परियोजना के जरहाजेल गांव को जरहाजेल व बरमपुर के डंपिंग को समतल कर बसाने की तैयारी है। इससे उनकी चिंता बढ़ गई है। कोयला खदानों के जमीन का अधिग्रहण करने पर गांवों के बसाहट की चुनौती रहती है। कई बार प्रभावितों को चिन्हित स्थल पर आपत्ति दर्ज कराते हैं, इस कारण भी विस्थापन की प्रक्रिया में देरी होती है। बसाहट नहीं लेने पर अलग से राशि देने का भी एसईसीएल ने प्रावधान किया है। शहर के नजदीक अब जमीन नहीं होने की चिंता से गेवरा बस्ती के प्रभावितों ने मांग की है और जनसुनवाई के दौरान एसईसीएल के आश्वासन की याद दिलाई है। गेवरा परियोजना से प्रभावित नराईबोध व भिलाई बाजार के ग्रामीणों को भी कुसमुंडा फोरलेन किनारे ही बसाने की तैयारी है।

















